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मनुआ - 38

मनुआ किसी बुजुर्ग के साथ बैठा बात कर रहा था , जब मैं पहुंचा । परिचय कराते हुए उसने कहा - " बाबूजी ! ये हैं मंडल दा ...अपने प्लांट के ही कर्मचारी थे , अब सेवा निवृत्त होकर यहीं मकान बनाकर रहते हैं और मंडल दा ये मेरे यूनियन के वरिष्ठ साथी हैं ....।"
मैंने बुजुर्ग को नमस्कार कर पूछा - " अपना मकान क्यों , आपने कंपनी का क्वार्टर नहीं खरीदा ? "
उन्होंने मुझे घूरते हुए कटाक्ष किया - " आपकी यूनियन तो विरोध में थी , तब कैसे खरीदता ...? " फिर हँसते हुए बोले - " दरअसल बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित था ...सोचा था , साल दो साल बाद ले लूँगा । किंतु.....।"
मैं कुछ झेंप सा गया । बात का सिरा पकड़ते हुए मनुआ ने कहना शुरु किया - " कुछ भी हो , वह गलत फैसला था । खैर , आप न दादा , दूरदर्शी थे , जो अपनी जमीन खरीद चुके थे ।"
बात बदलते हुए मैंने पूछा - " और सुनाइए मंडल दा , बाल - बच्चे कितने हैं और कहाँ हैं ? "
" अरे बाबूजी , दादा इसमें भी ' पुंगे ' (जीते) हुए हैं ....दो हीं लड़के हैं ....एक अमरीका में है और दूसरा......।"
" दुबई में...। " -- मंडल दा ने अस्फुट स्वर में मनुआ की बात पूरी की और दीर्घ श्वास लिया । मैने खुशी का इजहार करते हुए कहा - " चलो , अच्छा है ....दोनों हीं वेल सेटल्ड हैं ....।"
मेरी खुशी तब काफूर हो गई  , जब मैने मंडल दा के चेहरे को सफेद और आँँखों के कोर में आँसू की झिलमिलाती बूंदों को देखा ।
" बाबूजी ! यही तो रोना है । पैसा हीं सबकुछ नहीं होता । बुजुर्गों को जिस सहारे की जरूरत होती है , वो पैसे से नहीं मिलता ....अपनों से मिलता है । पर ......, बेरोजगार बेटा और कुवाँरी बेटी बाप - माँ की छाती पर सिल की तरह होते हैं । काश ! इस शहर के बच्चों को नौकरी इसी शहर या आस पास मिल जाती ! "
" हमने सपना तो यही देखा था मनुआ , इतना बड़ा स्टील प्लांट था ....बेटों को मर - खपकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई  , किंतु यहाँ तो स्थिति हीं बदल गई । कहाँ तो और विस्तार होता ....नये कल - कारखाने लगते और कहाँ  इस प्लांट में भी मजदूरों - कर्मचारियों की संख्या लगातार घटती गई। कभी कुछ वैकेंसी हुई भी , तो एक अनार सौ बीमार ।"
" सौ नहीं ....लाखों बीमार दादा , ऊपर से सब काम ठेके पर होने लगे .....पुराने ...रिटायर्ड ऑपरेटरों को मामूली वेतन पर ....दिहाड़ी पर  रखा जाने लगा....। "
" ऐसा क्यों हुआ मनुआ ? ...... सरकार की नीतियों के कारण ।" -- मैने मनुआ को बीच में हीं टोक दिया ।
" ठीक कहते हैं आप , सरकार की नीतियों के कारण । " -- मंडल दा ने समर्थन करते हुए कहा  --" और इसीलिए हमने सरकार बदल दी .....पर नीतियां नहीं बदलीं । बड़ी आशा थी मोदी जी की मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप ..वा स्टैंड अप इंडिया से .....सोचा था कि यहाँ जॉब क्रिएट होगा , तो बच्चों की कंपनियां लौट आयेंगी ......।"
" पर पानी फिर गया , क्यों दादा ? " -- मनुआ ने चहकते हुए कहा -- " कैसे सोच लिया था दादा ! क्या इन्होंने कभी इससे अलग किसी नीति की बात की थी क्या ? अरे , वह तो सिर्फ करैला था और यह है नीम चढ़ल करैला । इधर हमलोगों को जाति - धरम के बवाल में उलझा दे रहे हैं और उधर धड़ाधड़ नई नीतियों को लागू किये जा रहे हैं ।"
" जो हो मनुआ , पर इस शहर को देखकर बहुत दुख होता है । इन्हीं आँखों के सामने इसे जनमते और बढ़ते देखा था और आज उजड़ते भी देख रहा हूँ  ! महज आधी सदी उम्र है इसकी । बूढ़ों का शहर बनकर रह गया है । रोजगार की तलाश में दूसरी पीढ़ी पलायन कर गई । ...अब चलता हूँ मनुआ , बूढ़ी घर में बैठी चिंता कर रही होगी । "
मंडल दा धीरे से उठे और छड़ी टेकते चल दिये । मैं और मनुआ टक - टकी बाँधे उन्हें जाते देखते रहे । कुछ देर के लिए हमारे बीच चुप्पी छाई रही । चुप्पी मनुआ ने तोड़ी ---" बाबूजी ! अजीब विडंबना है । विकास का यह कैसा रूप है , जब रिश्ते - नाते सब बेमानी हो जायें ! "
" यही पूंजीवादी विकास है मनुआ  , जब मनुष्य के सोच के केंद्र में सिर्फ और सिर्फ पूंजी होती है ....और इस पूंजी का आधार मुनाफा होता है ...बेइंतहा मुनाफा ! किसी ने कहा है कि जब मुनाफा दो सौ प्रतिशत निश्चित हो जाए तो यह पूंजी अपने मालिक का शिकार करने से भी नहीं चुकती । "
" बाबूजी ! यही सब सोचते हैं तो मार्क्स प्रासंगिक लगने लगते हैं और समाजवाद एक आदर्श प्रस्तुत करता नजर आता है । पर , इसकी राह में बहुत रोड़े हैं ।"
" उन्हीं रोड़ों को हटाने की जिम्मेवारी हमें उठानी है भाई ! " ---- कहकर मैंने मनुआ की पीठ थपथपाई ---" चलो , हमें यूनियन दफ्तर भी जाना है ।

--- कुमार सत्येन्द्र

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