कल शाम मैं मनुआ के घर पहुंचा तो वहाँ मानो चौपाल सा लगा था । बहस के केंद्र में था - कर्नाटक का नाटक । हलांकि अपने चरम पर पहुँचकर नाटक का पटाक्षेप हो चुका था । अंतिम दृश्य में खलनायक रो - गाकर अपना दुखड़ा सुना चुका था , जैसा कि फिल्म " भाई हो तो ऐसा " में विलेन ने अंत में रोकर दर्शकों की सहानुभूति पाने की कोशिश की थी । अब बहस जनतंत्र की हिफाजत किसने की , इसपर टिक गई थी ।मनुआ ने इसका श्रेय सुप्रीम कोर्ट के मा. जजों को देते हुए कहा - " आशा तो न था पांडे भइया कि जज साहबान लोग ......बाकि ऊ लोग ऐसा निर्णय दीहिन कि ठग - जोड़ी की दाल हीं नहीं गली .....वरना राज्यपाल महोदय ने तो पंद्रह दिन का समय देकर खरीद फरोख्त का पुख्ता इंतजाम कर दीहिन थे । "
" दूर बुड़बक , तू का समझता है कि शाह जी दिल में ठान लेते तो पलड़ा भारी न हो जाता । बाकि मोदी जी बोलिन कि न हम कोई अनैतिक काम नहीं करेंगे , जैसा कि ऊ दोनों दल कर रहे हैं ....एक दूजे के खिलाफ लड़े और अब .....। "
" का बात है भइया ! ...ऊ मुँह और मसूर के दाल ! ....ऊ लोग भी नैतिकता की बात कर रहीन है , जे कि गोवा से लेकर मणिपुर तक में सब जगह इसी तरह से सरकार बनाईन है । "
" अब देखो मनुआ , तुमलोग जो है न , कौनो राह न चलने देना चाहते हो । गोवा - मणिपुर में सरकार बनाईन तो आलोचना कि बड़ी पार्टी को मौका न दीहिन और हियाँ बड़ी पार्टी को मौका दीहिन तो .......। "
" ऐ पांडे भइया , बतिया के घुमाइए न ...ई लोग जब जैसा तब तैसा नीति बनाते हैं ....हम्मर देश के कानून के भी अज्जब बिडम्बना है ....सब जगह लूप होल छोड़ दिया गया है ...बहुते घालमेल है ।"
" ई तुम ठीक बोला .....सत्तर साल से ई लोग ओकरे फायदा उठाईन है और अब दोसर उठा रहा है ...तो मिरची लग रहा है ...। "
" अपने हियाँ चुनाव परनाली में गड़बड़ी तो शुरु से है ...सब दिन अल्पमते के सरकार बनी है ....अब ईहे चुनाव में देखिए कि 38%वाले को 78 सीट और 36% वाले को 104 सीट .....31 % वोट लेके मोदी जी पूर्ण बहुमत की सरकार चला रहे हैं ....! "
" हँ ..तो अप्पन संविधनवा में जे रहेगा , वोही न होगा । "
" ऊ तो होइए रहा है भइया , बाकि अब डिमांड शुरु हो गया है कि एकरा बदला जाए । "
" हँ....तो तुमलोगों का तो काम है डिमांड करना ....चाहे ओकरा कोई सुने चाहे न सुने ....तू लोग डिमांड करते रहते हो और बोनस - पेंशन बंद हो जाता है...श्रम कानून बदल जाता है ....बाकि कोई बात न है ....लगे रहो ...। "
" हम तो लगले रहेंगे पांडे भइया .....काहे कि हमलोग अन्हरायल न हैं ....अप्पन पैर पर अपने कुल्हाड़ी न न मारेंगे ....ई डिमांड अब जल्दीए जोर पकड़ेगा .... ऊ का कहते हैं ....हँ... चुनाव अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से हो ....। "
" हँ...हँ....लगे रहो ....बंगाल - त्रिपुरा से तंबू उखड़िए गया न , बाकि बचा केरल ....। "
" एतना गफलत में मत रहिए पांडे भइया ! हम्मर तंबू तब तक रहेगा , जबतक समाज में गैरबराबरी और शोषण है ....बंगाल के पंचायत चुनाव में जे खूनी खेल और गुंडागर्दी हुआ है , ऊ पूरा देश देख रहा है ....गरीब का खून बेजा नहीं जायेगा भइया ....हम शहादत देके भी जनतंत्र को बचाने में लगे हैं .....आपकी तरह न पैसा पर बिकते हैं और न पैसा से खरीदते हैं ....।"
" हँ...हँ....अब तुम्हीं लोग तो खाली धरमात्मा रह गए हो ....बाकि बचे ही कितने हो ...? " --- कहते - कहते पांडे उठा और वगैर मनुआ का जवाब सुने चलता बना । मनुआ ने मुझे देखा और मुस्कुरा दिया --- " बाबूजी ! इन लोगों में तर्क से बहस करने की सामर्थे नहीं है ...देखे न भाग गए । "
पांडे के जाने के बाद वहाँ बैठे अन्य लोग मनुआ से बंगाल के पंचायत चुनाव की चर्चा करने लगे ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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