Skip to main content

मनुआ - 41

कल शाम मैं और मनुआ सीटू के स्थापना दिवस कार्यक्रम में शामिल होकर मनुआ के घर पहुंचे हीं थे कि पांडे आ धमका । पर कल का पांडे कुछ बदला - बदला सा था । न पहले वाली गिलहरी सी फुदकन और न ही गौरेया वाली चहचहाहट । घोंघे की तरह मुँह बंद ।
आया और सर झुकाए चुपचाप बैठ गया । हमने एक दूसरे की ओर देखा और आँँखों ही आँँखों में एक दूसरे से पूछा -- बात क्या है ? कुछ पल हमारे बीच चुप्पी पसरी रही ।

चुप्पी को तोड़ते हुए मनुआ ने पूछा - " का बात है पांडे भइया , इतना उदास काहे हो ? "

पांडे उसी मुद्रा में बैठा रहा ।
" कुछो बताइएगा कि......और नहिये बताना था , तो हियाँ आये ही काहे ? "
" तुमको न बताऊंगा , तो किसको बताऊंगा मनुआ ?....माना कि हमरे बीच राजनीतिक मतभेद है , बाकि मैं जानता हूँ कि जाती मामले में तुम से बढ़ियाँ सुझाव दोसर केहू न देगा .....तभिए तो आया हूँ ।"
" तो , का बाबूजी से .......?
" अरे न...न...सर जी से भी का छिपाना ....इनमें और तुम में हम कोई फरक नहीं मानते.....कल्हे से हम परेशान हैं मनुआ ....न उगलते बन रहा है और न निगलते बन रहा है ...।"
" ए भइया ! अब बुझौनिया मत बुझाइए ....जल्दी से मामला बताइए ..।"
" ऊ का है कि ...तुम तो जनबे करता है कि हमरा पूरा खनदान ...अरे खनदाने काहे , हमरी पूरी की पूरी जात - बिरादरी , एकाध परसेंट को छोड़ कर ई सरकार का समर्थक है और ई के चलते ओकर जेतना सहयोगी संगठन है , सबका समर्थक है ....एक बार तुमको बताए न थे कि हमर लड़िकवा गौ रक्षा दल में .....। "
" बतयबे नहीं किये थे , बल्कि अगरा - अगरा के बताए थे ...खैर , तो उसको का हो गया ? "
" अरे , हो का गया ! ....उसको कुछो नहीं हुआ है ...अब ऊ दू कदम और आगे बढ़ गया है ....। "
" यानी कि परमोशन हो गया है ....तो ,...ई तो खुशी की बात.. ...।"
" अरे मनुआ , जरल पर नीमक मत छिड़को ....परमोशन नहीं ....ऊ अब बजरंगदल ज्वाईन कर लीहिस है और ओकरा में गोली - बंदूक चलावेला सीख रहा है....। "
" अच्छा , तो अब ऊ वाला नारा लगा रहा है का .....ऊ का कहते हैं .......हँ.....जय बजरंग बली , तोड़ दुश्मन की नली ......।"
" देख मनुआ , तुमको चुहल सूझ रहा है और हियाँ अपनी जान पर पड़ी है .....समझाते हैं , तो उल्टा हमरे समझाने लगता है .....कहता है कि धरम और देश रच्छा खातिर डेग बढ़ा दिया है , तो अब पीछे न हटायेंगे ....। "
" आँय भइया ! तो का गलत बोल रहा है ? बचपन से जो सुनता रहा , उसी को न सीखेगा ....हमने केतना बार आपको समझाया कि ई जो बतकही हो रही है न भइया , ऊ सही सवाल से ध्यान भटकावे खातिर हो रही है ....। अब बताइए न , चार साल से ई सरकार का कीहिस है -- बकैती और फकैती छोड़कर । न रोजी - रोजगार बढ़ा और न ही हम मजूरन का पगार बढ़ा .....कभी गऊ रच्छा , तो कभी लभ जेहाद ...तो कभी धरम पर खतरा । "
" अरे ऊ धरम पर खतरा तो हइए है ....हम भी ऐसा  मानते हैं .....बाकि उसके लिए का हम ही रह गए हैं ....अस्सी करोड़ को फिकिर न है का ...... और लोग हैं न ....ई ससुर काहे जा रहा है ओखरी में मुंड़ी डालने ....? "
" वाह भइया ! खूबे कहे .....धरम का मलाई खाइएगा आप और रच्छा करे में जान गंवाएगा ढोरवा - मंगरू !... का बात है ! ....वैसे एकबार फिर हम ईहे कहेंगे कि असल मुद्दा मंदिर - मस्जिद न है .....रोजी - रोजगार है ....मजदूर का पगार है....शिच्छा - स्वास्थ है ....जरइत खेती और मरइत किसान है .....।"
" दुर बुड़बक , हम अप्पन दुखड़ा लेके आए थे कि तू कुछ हल बताएगा , तो तू दोसरे राग अलापने लगा ....। " --- कहते हुए पांडे उठा और चल दिया । मनुआ ने मेरी ओर मुस्कुराकर देखा और कहा -- " बाबूजी ! ई लोग न जाने कब सरकार की चाल को समझेंगे ? "
" समझेंगे मनुआ , जब खुद पर बीतेगा न , तब सब समझ में आ जाएगा । अच्छा , तो अब मैं भी चलता हूँ । 12 जून वाला कार्यक्रम याद है न ? "
" का कहते हैं बाबूजी ! ....ऊहे न ....चार्टरवा देने जाना है परबंधन को ...? " --- उसने हँसकर जवाब दिया ।

---- कुमार सत्येन्द्र

Comments

Popular posts from this blog

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूँजीपति के मुनाफ़े का सफ़र. अंतिम भाग  हमने ये तो स्थापित कर लिया कि पूँजीपति अपना मुनाफ़ा ना तो कच्चे माल और ना ही उत्पादित वस्तुओं के ख़रीद बिक्री में कमाता है। वह मुनाफ़ा कमाता है उत्पादन के दौरान। लेकिन कैसे? इसको समझने से पहले मैं आपको वापस मार्क्स के दास कैपिटल से एक और शब्द को समझाता हूँ। वह शब्द है “श्रम शक्ति” या “labour power”.  पूँजीपति मज़दूरों से उनके श्रम शक्ति को ख़रीदता है और बदले में उनको मज़दूरी देता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मज़दूरी = श्रम शक्ति।  आपने कभी ये सोचा है कि किस प्रक्रिया से मज़दूरों की न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इसे तय करने वाली कमिटी एक लम्बे प्रक्रिया के बाद यह कैल्क्युलेट करती है कि मज़दूर को महज़ अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कितना मज़दूरी दी जाए। ये कोई नई बात नहीं है। इतिहास में भी सर्फ़ और ग़ुलामों को उत्पाद का उतना ही हिस्सा दिया जाता था जिस से वो महज़ ज़िंदा रहें। उनका हिस्सा परम्परागत तरीक़े से तय किया जाता था जब कि आज के आधुनिक युग में मजदूरों की मज़दूरी श्रम के डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। हालाँकि मज़दूर एक साथ आकर अपनी...