मैं मनुआ के दरवाजे पर पहुंच कर इधर उधर देख रहा था कि भीतर से कराहने की आवाज आई । कमरे में झाँका , तो देखा कि खाट पर चादर ओढ़े कोई सो रहा है । मैंने धीरे से हाँक लगाई । रसोईघर से निकलती हुई उसकी पत्नी ने कहा --" बीमार हैं ...।"
मनुआ ने मुँह से चादर हटाते हुए पूछा - " कौन ...?"
मुझपर नजर पड़ी तो धीमी कराह के साथ बोला --" आइए बाबूजी ...! "
"क्या हुआ भाई ? दो दिन पहले तो.....।"
" ठीक ही थे बाबूजी ...अचानक पेट पर लात पड़ी और फिर तो पेट से पीठ तक घावे घाव ...। "
" लात ..! किसकी लात....? "
" बाबूजी ! हम गरीबन के पेटे पर तो सबकी लात पड़ती है ...। " --- कहकर उसने मुस्कुराने की कोशिश की ।
" मैं कुछ समझा नहीं भाई , किसने मारा ? "
" रोग ने बाबूजी ....पहले पेट पर फोड़े दिखे और फिर देखते देखते लड़ी बनाते हुए पीठ तक फैल गए । "
" डाक्टर से नहीं दिखाए ?"
" दिखाए बाबूजी , दवाई चल रही है ...।"
उसने चादर हटाते हुए पेट से पीठ तक दिखाया । बड़ा हीं भयानक मंजर था । गुच्छों में लाल - पीले- काले फफोले एक नियत चौड़ाई में पेट से पीठ तक भरे थे ।
" देखे न बाबूजी , ई रोग भी हमरे पेेट पर लात मारीस है ....।"
" डाक्टर ने क्या रोग बताया है ? "
" इंग्रेजी में कुछ कहे रहीन ....ई कगजा पर कुछ लीखीन है ..।" --- उसने एक कागज मेरी ओर बढ़ाया । उसपर " एच.जोस्टर " लिखा था ।
" का तो चिकेनपॉक्स के भायरसवा फिर से ...ऊ का कहते हैं ......।"
" रि-एक्टिवेट हो जाता है ....इसको डाक्टर लोग हर्पिस जोस्टर कहते हैं ...तकलीफ तो बहुत होगी....। "
" अरे डागडर का बोलेगा .....ई मइया जी हैं ...। " --- कहते हुए पांडे ने घर में प्रवेश किया ।
" कल्हे से कह रहे हैं कि अरे बरा लो , नीम की पत्तियों से हवा झलो और घर को शुद्ध करो ....बाकि ई काहे को सुनेगा ....दौड़ गया डागडर किहाँ .....ई सब में तीन दिन के बादे दवा- बीरो करना चाहिए ....। "
" ए पांडे भइया , अप्पन थिसिसवा तनिक कमे झारिए । ई है एक्कीसवीं सदी ।ई सदी में ई सब रोगन के ईलाज हो जाता है । का समझे ? "
"खूबे समझ रहे हैं ....तभिए न उधर केरल में तू लोग धरम - करम के नाश करे पर तुले हो ....। "
" फिर झूठ । का भइया , आपलोगन को झूठे के पढ़ाई होती है का ? सुपरीम कोर्ट में मुकदमा कीहिस था ....ऊ का कहते हैं ....आपका आरएसएस , ई पर फैसला दीहीस है सुपरीम कोर्ट .....अब बताइए कि राज्य सरकार ई में कहाँ से आ गई । फैसलवा लागू करे में आप ही लोग अब टाँगो अड़ा रहे हैं ...तो कानून बेवस्था सरकार को दुरुस्त रखना होगा कि नहीं ...।"
" अरे भकचोन्हर , ईहे तो हम कह रहे हैं कि धरम - करम में सरकार के सोच समझ के काम करना चाहिए । बेकारे न लाठी-डंडा चला रही है ...। "
"ई लो , उल्टा चोर कोतवाल के डाँटे ....आप लोग कोर्ट के औडर का अपमान काहे कर रहे हैं .....शांति से लागु काहे न होने दे रहे हैं ...ऊ पार्टी अध्यक्ष ऊहाँ जाके और आग लगा रहे हैं ....अरे फैसलवा न ठीक है , तो आप लोगन की सरकार है , ऊ के कानून बना के पलट न दीजिए । "
" देखो मनुआ , धरम का मामला बिस्वास का चीज है , आस्था के बात है , ई में कौनो राजनीति नहीं चलेगा ....।"
" तो सरकार से बोलिए कि कानून......।"
" अब तू आनून - कानून कहके राजनीति शुरु कर दिया ....हम कौनो पार्टी के न हैं ....हाँ अप्पन धरम किसी को बिगाड़ने भी न देंगे । " --- कहते हुए पांडे चल दिया । मनुआ मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
Comments
Post a Comment