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कैसे कहूँ दिवाली है

रात अमा की काली होती
अपनी सुबह भी काली है
कैसे कहूँ दिवाली है ?

खून - पसीना खूब बहाया
खेतों में सोना उपजाया
महलों वाले लूट लिये सब
अपनी बखरी खाली है
कैसे कहूँ दिवाली है ?

अच्छे दिन आयेंगे अपने
खूब सजाए हमने सपने
न जाने किसके दिन बहुरे
अपनी हालत माली है
कैसे कहूँ दिवाली है ?

रहबर करता राहजनी है
फूल नहीं यह नागफनी है
ताज पहन जो तख्त पे बैठा
लगता हमें मवाली है
कैसे कहूँ दिवाली है ?

जन - जन को जब काम मिलेगा
काम का वाजिब दाम मिलेगा
खिले हुए  चेहरे  दीखेंगे
तभी कहूँ दिवाली है

कैसे कहूँ दिवाली है ?

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