मैं और मनुआ 8-9 जनवरी , 19 को होने वाले आम हड़ताल की चर्चा कर ही रहे थे कि पांडे आ पहुँचा । दुआ - सलाम के बाद पांडे ने मनुआ को लक्ष्य कर कहा - " का हो , ई अवार्ड गैंग फिर सक्रिय हो रहा है का ? "
" वो कैसे ....कुछ हुआ का ...? "
" अरे , नहीं सुना का ....ऊ फिलीम वाले नसीर भाई का कह रहीन है....अब उतना हीं डर लग रहा है भाई , तो काहे ला हियाँ हैं ...चले जायें ईरान-पाकिस्तान । "
" आपलोग न गज्जब आदमी हैं भइया ! ...पूरी बात सुनते भी नहीं और लगते हैं किसी को भी पाकिस्तान भेजने ....ऊ कहीन कि हमरे बच्चों से कोई धरम पूछेगा तो , ऊ लोग तो डर जायेगा , काहे कि उनका बाप मुसलमान और माँ हिंदू है ...अब ऊ लोग अपना धरम का बतायेगा... उनका तो कोई मजहब हीं नहीं है ? "
" अरे , ई कौन बड़ी बात है.....बच्चों का धरम बाप वाला होता है और का ....। "
" वैसे उनके घर में ऐसा नहीं है ..... धरम की कोई चर्चा ही नहीं है....उनका मानना है कि वगैर कोई धरम माने भी बच्चों को अच्छाई और बुराई की समझ दी जा सकती है....अच्छा , ई तो बताइये कि कौन घटना लेके ऊ ऐसा बोलिन है , मालूम है ....बुलंदशहर में खेत में मरी हुई गाय मिली और लोग खूबे हंगामा कीहिन ....ऊ हंगामा में ईंटा - पत्थर से लेके गोली - बंदूक तक सब चली और एक ठो कर्मठ - ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर मारा गया ....। "
" हँ ..तो उसकी जाँच होइए रहा है न ....गऊ माता के जे लोग मारके फेंकीन है , उनको जल्दीए पकड़ा जाएगा ...। "
" अच्छा ! ...और जे लोग इंस्पेक्टर को मारिन है ...उनको ....? "
" अरे , ऊहो सब पकड़ायेंगे .....। "
" बाकि प्राथमिकता गऊ के हत्यारे को पकड़ना है , आदमी के हत्यारे को नहीं , है न ?..... ईहे कुल नसीर भाई के चिंता के कारण है भइया ....ई धरम के नाम पर जे भीड़ - हत्या हो रही है न ....कानून का शासन खत्म हो रहा है न , ईहे चिंता के विषय है । "
" अरे भकचोन्हर , तो जे जैसा करेगा , ऊ वैसा भरेगा ....ई में डरे - डरावे के बात कहाँ से आ गई ? "
" के कह रहा है कि डरने की बात है ...ऊहो तो कहीन है कि फिकिर होती है ....आखिर में बोलिन कि चिंता की तो है , पर डरने वाली कोई बात नहीं है.....और ई भी कहिन कि हमरा देश ईहे है , इसे छोड़कर कहीं जायेंगे भी नहीं..।"
" अच्छा , ई बताओ कि ई लोग चुनावे के टाईम पर काहे ई सब बात बोलते हैं ? "
" गज्जब बात करते हैं भइया ! घटना आज घटी है , तो परतिकिरिया भी आजे न होगी ....बाकि आप ई बताइए कि राम मंदिर बनावे के बात चुनावे के टाईम काहे होता है ? "
" के कहता है मनुआ ....ई तो बरसों से चल रहा है .....हँ कभी तेज , कभी धीमा होते रहता है ।"
" ई काहे भइया , जबकि जमीन का केस सुप्रीम कोट में चल रहा है । "
" अरे बबुआ , केतना दफा बतावें कि एकर फैसला कोट से न होगा ....ई हिंदू के आस्था के बात है । "
मनुआ ठठाकर हँस दिया ---" वाह भइया , राफेलवा के मामला में कोट के फैसला आया तो खूबे मिठाई बँटा और ई मामला में......एकरे कहते हैं मीठा- मीठा गप - गप और कड़वा - कड़वा थू-थू ....। "
" अरे बुड़बक , तू भी पप्पुआ के चक्कर में फँस गया है का ....ऊ तो बदहवासी में उल्टा-पुल्टा आरोप लगा रहा है ....।"
" उल्टा - पुल्टा ऊ नहीं कर रहा है भइया , आपका गप्पुआ कर रहा है ....कोट में जे डोकुमेंट दिया है , ऊ भी गलते पकड़ा गया ...तो अब कह रहा है कि टाइपिंग मिस्टेक हो गया है ...। "
" ठीके तो कह रहे हैं ....का टाइपिंग मिस्टेक नहीं होता है , बोलो । "
" भइया , ई कौनो मजदूर के छुट्टी का दरखास्त तो नहीं था न.....जो जैसे - तैसे टाईप कर दीहिन ....कोट में जमा होने वाला हलफनामा था....ई सरकार के सब मंत्री - अधिकारी बउराहे हैं का .....साइन करे के पहिले ठीक से पढ़े क्यों नहीं ....तो बात ई है कि ई लोग कोट को गुमराह करने के लिए ऐसा कीहिन है ...। "
" अब तुम्हीं लोग तो काबिले हो , बाकि सब बउराह है ....।"
" छोड़िए भइया , ई बताइए कि 8-9 जनवरी के हड़ताल में साथ दे रहे हैं कि नहीं ? "
" ई कुल देश हित में नहीं है मनुआ.....और राजनीति से प्रेरित है .....ई से कुछो न होगा... अबकियो मोदी जी जीतके आ रहे हैं ...। " -- कहते हुए पांडे उठा और चल दिया । मनुआ ने मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया और कहा --" ई लोगन के आँख से जात - धरम का परदा जल्दी न हटेगा बाबूजी ! " मैंने सिर हिलाकर हामी भरी ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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