Skip to main content

मनुआ - 45

मैं और मनुआ अगामी आठ-नौ जनवरी के आम हड़ताल की तैयारी स्वरूप होने वाली गेट मीटिंग की चर्चा ही कर रहे थे कि पांडे आ धमका ।
मनुआ - " नया साल मुबारक हो पांडे भइया ! "
" नया साल !....तू पगला गया है का रे ...माघे में नया साल मना रहा है ...भुलाइए गया है अप्पन रीति - रिवाज का ? "
" का कहते हैं भइया ....सारी दुनिया नया साल मना रही है और ....।"
" ई हमरे धरम के अनुसार नहीं है भाई , ई उनका नया साल है ... ऊ का कहते हैं ईसाई लोगन का । "
" अच्छा । तब अपना कब होगा ? "
" संबत जरने के बाद ....चैत में ....।"
" चैत में नया साल आप ही का होगा कि समूचे देश का ....? "
" ई लो ...हमरे काहे , सबका होगा । "
" ई कैसे भइया , जैनी और गुजरात के सब लोग तो दिवाली के दूसरा दिन , पंजाब के लोग बैशाख में , बंगाल वाले भी पहिला बैशाख में नया साल मनाते हैं ...पारसी लोग....।"
" दूर बुड़बक , तू फिर दूसरे धरम की बात करने लगा ....अरे हमलोगों का नयासाल चैत से शुरु होता है , बस । "
" तब ई बंगाल - पंजाब वाले का हमलोग में नहीं आते भइया ? "
" आते हैं तभिए तो फागुन के बाद नयासाल मनाते हैं ....।"
" और ई गुजरात.....।"
" तुमलोगों का ईहे बात हमको नहीं पसंद है ...बात का बतंगड़ बना देते हो ...अब देखो न , उहँवा ...केरल में तू लोग का कर रहे हो ....बेमतलब मंदिरवा को भरष्ट करने पर तुले हुए हो ...।"
" कौन कह दिया है भइया ...अरे ई तो सुपरीम कोट का फैसला है ....अब ऊ में दूसरा कोई का करे । "
" अरे , सुपरीम कोट के कहने से का हुआ ...करोड़ों लोगन के आस्था भी कोई चीज है कि नहीं ....ई धरम - करम के मामला में जज लोगन को भी सही ढंग से बिचार करना चाहिए था । खैर , ऊ जो कह दीहिन तो कोई पत्थर पर लकीर खिंचा गया का....ऊहाँ के सरकार काहे मंदिरवा को भरष्ट करने पर तुलल है ? "
" सरकार कुछो नहीं कर रही है भइया , ऊ खाली सुपरीम कोट के ऑडरवा के लागू होए में जे अशांति हो रही है , उसको रोक रही है । अब कोई सरकार अपने राज्य में हो - हंगामा तो नहीं होने देगी न ! "
" हमको एतना बुड़बक मत समझो मनुआ , हम भी रोजे अखबार पढ़ते हैं और टीवियो देखते हैं ...तू कमुनिस्ट लोग खुद तो धरम - करम मानते नहीं , दूसरों को भी डिस्टरब करते हो ।"
" अब ई में कमुनिस्ट कहाँ से आ गया भइया , ई तो हर सरकार के फरज बनता है कि ऊ संविधान की रच्छा करे , काहे कि ऊ संविधान के शपथ लेके ही तो सरकार बनाते हैं ।"
" चल , बड़ा आया है संविधान के रच्छा करे वाला ...।"
" अच्छा भइया , कल के हड़तलवा में जोग दे रहे हैं न ? "
" काहे का हड़ताल हो .....चुनावे के बेर हड़ताल सूझता है का .....ई सरकार जो किहीस है , सत्तर साल मे न हुआ रहा और तुमलोग सबदिन इसका टाँग खिंचे में लगे रहे हो ....। "
" ई बात जे हे से कि हंड्रेड परसेंट सही बोले भइया ! .... ऐसा काम कौनो सरकार नहीं किया था..... नोटबंदी और जीएसटी लागू करके हजारों लोगन की नोकरी कोई नहीं छीना था , गाय - गोबर के नाम पर लड़ा के गाँव के गरीबन का कमर कोई नहीं तोड़ा था... बहिला - बहेंगवा के परकोप से किसानन को रतजग्गा कोई नहीं कराया था ......।"
" अरे , चुप भकचोन्हर .... ई कुल बिपच्छी पार्टी के फैलावल झूठ है .... ई सरकार तो ऐसा है कि अमेरिका तक में डंका बजा दिया है ....दुनिया के सबे देश ई सरकार के लोहा मान लीहिस है .... नोटबंदिया में सैंकड़ों फरजी कंपनियां पकड़ाईस है ....देखना , एक दिन ई कुल जना जेहल के हवा खायेंगे .....।"
" और ई राफेलवा में जे लोग दलाली खाईन है , उनका का होगा भइया ? "
" राफेलवा के मामला मत उठाओ , समझा । ऐसा डील आजतक नहीं हुआ था ....सीसा ऐसा साफ और गंगा ऐसा पवित्र .... दुश्मन के हाथ का खिलौना बन रहा है पप्पुआ और कुछ नहीं ।"
" तब जेपीसी से जाँच कराके दूध का दूध और पानी का पानी काहे नहीं कर लेते । "
" अब तू रजनीति कुछ ज्यादा ही बघारने लगा ...लेकिन सुन लो ई सरकार चाँद है चाँद और चाँद पर थूके से थूक खुदे के मुँह पर गिरता है ...। " --- कहते हुए पांडे उठा और चल दिया ।
" भाग काहे रहे हैं भइया ....चाँद के दगिया तो देखते जाइए ।" ---- कहकर मनुआ ठठाकर हँस दिया ।

Comments

Popular posts from this blog

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूँजीपति के मुनाफ़े का सफ़र. अंतिम भाग  हमने ये तो स्थापित कर लिया कि पूँजीपति अपना मुनाफ़ा ना तो कच्चे माल और ना ही उत्पादित वस्तुओं के ख़रीद बिक्री में कमाता है। वह मुनाफ़ा कमाता है उत्पादन के दौरान। लेकिन कैसे? इसको समझने से पहले मैं आपको वापस मार्क्स के दास कैपिटल से एक और शब्द को समझाता हूँ। वह शब्द है “श्रम शक्ति” या “labour power”.  पूँजीपति मज़दूरों से उनके श्रम शक्ति को ख़रीदता है और बदले में उनको मज़दूरी देता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मज़दूरी = श्रम शक्ति।  आपने कभी ये सोचा है कि किस प्रक्रिया से मज़दूरों की न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इसे तय करने वाली कमिटी एक लम्बे प्रक्रिया के बाद यह कैल्क्युलेट करती है कि मज़दूर को महज़ अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कितना मज़दूरी दी जाए। ये कोई नई बात नहीं है। इतिहास में भी सर्फ़ और ग़ुलामों को उत्पाद का उतना ही हिस्सा दिया जाता था जिस से वो महज़ ज़िंदा रहें। उनका हिस्सा परम्परागत तरीक़े से तय किया जाता था जब कि आज के आधुनिक युग में मजदूरों की मज़दूरी श्रम के डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। हालाँकि मज़दूर एक साथ आकर अपनी...