तुम अमर हो गये
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हम करते रहे रखवाली
खेतों की हरियाली की
तुम करते रहे चौकसी
देश की सरहद की
हमारी हथेलियों के छाले
तेरे पाँव के फफोले
बनते रहे - फूटते रहे
हम खेतों - खदानों में
सोना उपजाते रहे
तुम दुर्गम बीहड़ों में
आशियाना बनाते रहे
पूछती हैं हमसे
खेतों में लहरातीं
गेहूँ की बालियां
घर - आँगन में
फुदकती गोरैया
चितकबरी गाय की
हुमकती बछिया
गाँव की पगडंडियां
कि तुम कब आओगे ?
........................
निःशब्द हो जाते हैं हम
कैसे कह दें..कैसे....
कि तुम अब कभी नहीं आओगे
कभी नहीं.....!
यह तुम्हारा त्याग और बलिदान
नहीं है किसी तख्त औ' ताज के लिए
यह है तो सिर्फ और सिर्फ
अपने देश की लाज के लिए
उसकी आन-बान-शान के लिए
कैसे लुटने देते तुम
अपने पुरखों की दी हुई थाती
कैसे लुटने देते तुम
उनकी शहादत से मिली
यह अनमोल आजादी
और यह जो रुदन है पसरा
चौक - चौराहों पर
कल तुम्हें विस्मृत कर
करेंगे जुगाली
वातानुकूलित कमरे में
रचेंगे प्रपंच
अपनी कुर्सी की खातिर
उनकी चिंता की परिधि से
तुम कल भी बाहर थे
और कल भी बाहर रहोगे
किंतु , तेरे रक्त से सनी
देश की माटी
याद रखेगी तुम्हें
तुम अमर हो गये
मेरे लाल !
तुम ...अमर ....हो ...गये !
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