हत्यारा
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जरूरी नहीं
कि उसके हाथ में होगा
चमकता हुआ हथियार
रक्त में सना और धारदार
जरूरी नहीं
कि उसका चेहरा होगा
विकृत ,वीभत्स , कठोर
और रोबदार
जरूरी नहीं
कि वह करता होगा
क्रूर अट्टहास
भ्रामक और मोहक
मुस्कान भी
हो सकता है
उसके चेहरे पर
जरूरी नहीं
कि वह खुद ही
चलाए हथियार
वह रोप सकता है
हमारे जेहन में
अपने हथियार
और तब हम
हम नहीं रहकर
"वह" बन जायेंगे
हमारे हाथ
उसके इशारे पर
चलायेंगे हथियार
तब वह
एक व्यक्ति की नहीं
एक कौम की नहीं
एक समाज की नहीं
पूरे मुल्क की
हत्या कर रहा होगा
और अपने कुतर्कों से उसे
जायज ठहरा रहा होगा
और हम
उसके कुतर्कों पर
हिला रहे होंगे सिर
बजा रहे होंगे तालियां
बदल रहे होंगे परिभाषा
------ कुमार सत्येन्द्र
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