जब मैं मनुआ के घर पहुँचा , तो मनुआ को पांडे के साथ बहस में उलझा हुआ देखा । चुनावी सरगर्मी ने सबको बहस का मुद्दा दे दिया है । पांडे ने मोदी जी का समर्थन करते हुए कहा -- " ऐ मनुआ ... तू कुछ भी कह लो ...पर अभी मोदी जी के टक्कर में कोई नहीं है ...इतना कामे किहीन हैं कि...।"
" का काम किहीन हैं , जरा हम भी तो सुने..।"
" अरे ..जो सत्तर साल में न हुआ , ऊ पाँचे साल मे करके दिखा दिहीन है....। "
" ए भइया ....खाली दिखा दिहीन ...कर दिहीन बोलिएगा कि कुछ बतयबो कीजिएगा..। "
" तू का आन्हर - बहीर है ..जो न देख - सुन रहा है ...सउंसे दुनिया में डंका बज रहा है आ तुमको सुनाइये न दे रहा है...आज सउंसे दुनिया भारत का लोहा मान रहा है ..।"
" अरे ..कौन चीज का लोहा मान रहा है , कुछ बताइएगा कि खाली थेथरई कीजिएगा.. ऊ का कहते हैं ...हँ ..जीडीपी बढ़ गया का..... कि कल - करखाना में उत्पादन बढ़ गया.... कि खेतीबाड़ी का विकास हो गया... कि पढ़ लिखके बेकार बइठल लड़िकन के नोकरी - चाकरी हुआ...? हर साल दू करोड़ के रोजगार देवे का वादा कीहीन थे , उसका का हुआ....?"
" पाँचे साल में का - का चाहते हो कि हो जाए ! अरे , ई पाँच साल तो सत्तर साल के बिगाड़ले सुधारे में लग गया है ....। "
" का - का सुधारिन , तनि वोही एक दू गो बता दीजिए... और आप भुला रहे हैं , तो हम ही बता देते हैं .... सीबीआई को अइसा सुधारिन है कि ऊ सीने से गायब हो गया है...लोकपाल तो नहिए बनाईन ...भिजिलेंस विभाग को भी चौपट कर दिहीन....सुप्रीम कोट तक में हस्तक्षेप ....एने आरबीआई के बिना सलाह के नोटबंदी करके सब काला धन को झक्क सफेद कर दिहीन ...ऊ एगो कहौतिया है न ...कि माँग बचावे के चक्कर में कोखो गँवा दिहीस ....वही तो हुआ , काला धन तो नहिए पकड़ाया... आतंकवाद तो नहिये खतम हुआ ....सब छोट - मोट उद्योग - धंधा चौपट हो गया... देश वैसे ही बेरोजगारी से जूझ रहा था और बेरोजगारी बढ़ा दिहीन ।"
" ई देख बुड़बक के ...एकरा खाली निगेटिभेे दिखाई देता है ....अरे आतंकवाद के तो कमर तोड़ दिहीन है ....आजतक केहू के हिम्मत हुआ था कि घर में घुस के आतंकियन पर हमला करे ....अरे , मरद है मरद ....कहा सो किया और दुनिया देखती रही ... केहू चूँ तक नहीं किया ...दुश्मन सगरे घूम आया ....कोई साथ न दिया...। "
" का भइया .... सेना के पराक्रम के सेहरा दूसरा के माथे काहे बाँध रहे हैं ...? ..ई पुलवामा और उसके बाद जो हुआ , ऊ पर बखेड़ा मत खड़ा कीजिए ....और हमको मुद्दा से मत भटकाइए ...ई न बताइए कि ई छप्पन इंच के राज में किसान के आतमहत्या काहे न रुका... उनकोे फसल के लागत का डेढ़ गुणा काहे न मिला ... हमलोगों का माहवारी अठारह हजार काहे न हुआ ...समान काम के समान वेतन कोट के कहने पर भी काहे न लागु हुआ...? "
" अरे बुड़बक , धीरज धरे से उतरे पारा... तनिक धीरज रख ... अबकी जीत के आयेंगे त बकिया काम निपटायेंगे ....और विरोधी लोग को भी समझाओ न कि खाली - पीली काम में अड़ंगा न लगावें...। "
" अच्छा ! तो विरोधिए लोग इनको माल्या, नीरव मोदी , मेहुल भाई को पकड़ने से रोक दिहीन , है न भइया ? "
" अरे ऊ बात नहीं है , वैसे ऊ लोग भाग के जायेगा कहाँ ... एकदिन सबको बाँध के लायेंगे और बर - बकाया वसूल करेंगे ... नहीं सुना है ..अभी हाल ही में बोलिन है कि ऊ किसी को नहीं छोड़ने वाले । "
" अब उनका पर केहू के बिसवास नहीं है भइया .... काठ के हांडी फिर आग पर चढ़ावे के चक्कर में हैं , पर जनता अप्पन माँग पर अड़ल है ....पाँच साल का हिसाब माँग रही है ....।"
" अरे , जनता तो अभियो उनके साथ है ...हिसाब तुमलोग माँग रहे हो ....जनता के लिए इतना काम कर दिहीन है कि ऊ खुश है ....ई हे विरोधियन सब , जिसको खाने कमाने को नहीं मिला है , चिचिया रहे हैं .... ऊ का कहते हैं ...महाठगबंधन बना रहे हैं । "
" ई आपका भूल है भइया... कोई महागठबंधन नहीं बन रहा है ....जो जहाँ है , वहाँ इनका विरोध कर रहा है...किसान - मजदूर, नौजवान, महिला , कर्मचारी , छात्र कोई खुश न है ...बस , मौका आ गया है ...ई सरकार ने जो अराजकता फैलाई है , सबने देखा है.... इनकी लुटिया तो बस डूबने वाली है ..।"
" अरे , तुमलोगों का कौनो भैलू है ...टरटराते रहो ....देख लेना ...फिर ई जीत के आते हैं कि नहीं ....। " -- कहते हुए पांडे उठा और चल दिया ।
मनुआ ने हँसते हुए मुझसे कहा -- " पांडे भइया पक्का भक्त हैं बाबूजी , टस से मस नहीं होते हैं । "
हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो सृजन नवल हो गीत नया नव ताल - सुर संगीत नया नूतन जीवन हो रंग नया नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार मत मान हार उम्मीद नई संकल्प नया प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया हो तम विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र
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