हल और फाल की
जाति नहीं होती
खुरपी - कुदाल की
जाति नहीं होती
हँसिया - हथौड़े की
जाति नहीं होती
पीठ पर पड़ते कोड़े की
जाति नहीं होती
पेट पर पड़ते लात की
जाति नहीं होती
भूखों के लिए भात की
जाति नहीं होती
चोरों - बटमारों की
जाति नहीं होती
मेहनत के लूटेरों की
जाति नहीं होती
ऊँचे ओहदेदारों की
जाति नहीं होती
पूंजी के चौकीदारों की
जाति नहीं होती
शोषण की चक्की की
जाति नहीं होती
फिरकापरस्ती की
जाति नहीं होती
बस , रोटी और बेटी की
होती है जाति
चुनाव में वोटों की
होती है जाति
जिसने बिछाया यह जाल है
वही राजा है , मंत्री है
वही मालामाल है ।
---- कुमार सत्येन्द्र
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