Skip to main content

मनुआ - 47

मैं और मनुआ मई दिवस के आयोजन , लौहनगरी और मजदूरों के भविष्य पर चर्चा ही कर रहे थे कि पांडे आ टपका । आते ही उसने मोदी मंत्र का जाप शुरू कर दिया ।
" अरे , तुमलोग चाहे जेतना जोर लगा लो , मोदी को नहीं रोक पाओगे ...शेर है शेर । एगो फौजी गया था टक्कर लेने ...नोमिनेशनवे रद्द हो गया और कल तो , ऊ का कहते हैं , ऊनाईटेड नेशन में ऊ परस्तउवा पारित हो गया... गया बेटा अजहरवा ...अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोसित हो गया.... छप्पन ईंच का लोहा अबकी चीनियों को भी मानना पड़ा ....।"
" ऊ सब तो ठीक है भइया , बाकि ई बताइए कि कल आप कहँवा रह गए.... मजूर मैदान में नहीं पहुंचे ? "
" ऊहाँ कल का हो रहा था ....कौन पार्टी का नेता आया था ? ...वैसे चुनाव है तो चुनावी बेंग सब टरटरइबे न करेगा ....। "
" नहीं भइया , कल मजदूर दिवस था न , एक मई .. हम मजदूरों को ई दिन कभी न भूलना चाहिए...आठ घंटा काम करावे के खातिर जो मजदूर अप्पन जान दे दिहीन थे ....उनको याद करने का दिन था कल ...।"
" देख मनुआ , हम्मर हिंदू संस्कृति में ई दिन कोई महत्व का नहीं है .....हमलोग कल - करखाना के देवता बिसकर्मा जी के पूजा करबे न करते हैं ....जय बिसकर्मा ! "
" ऊ आप करते रहिए भइया ....बाकि ईहो सोचिए कि उनकर पूजा करे से हम मजदूरों को हमारा हक नहीं मिला है ....काम के घंटों में कमी ...छुट्टी ...पीएफ और पेंशन सहित जेतना सुविधा देख रहे हैं न , हमने लड़ के हासिल किया है ....तनी सा लड़ाई में ढिलाई हुआ कि नहीं ई कुल छीनाने लगा....। लड़िकन के पढ़ाई , हस्पताल में दवाई , पानी - बिजली सब फ्री था ....ई कुल के पैसा अब दे रहे हैं न ....? "
" दुर बुड़बक , ऊ सुविधा परमामिंट मजदूर को न था ....हमनी सप्लाई और ठेका वालों को थोड़ हीं था ....। "
" ऊ हे तो हम कह रहे हैं ....ई काहे हुआ कि परमामिंट मजदूर घटते गए और ठेका मजदूर बढ़ते गए ....? "
" ई लो., इतना भी नहीं बुझाता है ...जौन काम सौ रुपये में हो सकता है , उसके लिए मालिक हजार रुपये काहे खरचा करेगा ! "
" ठीक कह रहे हैं , तो इसमें घाटा किसको हुआ भइया ....जबकि बड़का कोट का फैसला है कि समान काम के समान मजदूरी मिले....कम से कम 18000/- मजदूरी महीना में सबको मिले ....ई काहे न लागू हो रहा है ? "
" लो ...तू हमसे पूछता है ....ई  तू न बताएगा ..तू लोग उनियन करता है  ....।"
" उनियन के शक्ति मजदूर होता है भइया ...जब मजदूरे मिलजुलकर न लड़ेगा तो .....।"
" लड़बे तो किया बंगाल में ....सब कल - करखाना बंद करा दिया न ....और सुनते हैं कि अबकी पत्ता साफ है ...हा....हा....हा....!"

पांडे ने जोर से ठहाका लगाया ।

" बुधी पर परदा पड़ता है , तो ईहे होता है भइया.... आदमी अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेता है ....बाकि बाद में अनुभव से सीखता भी है.....हँसिए , जेतना हँसना है हँसिए ...लेकिन ई बात गांठ में बान्ह लीजिए ...आप के आँख पर जो धरम का जाला पड़ा हुआ है न ...एक दिन जरूर छँटेगा ....।"
" कुछ नहीं मनुआ ...तू लोग सवारथ में अन्हरा गया है ....अभी अप्पन चिंता करे का समय नहीं है ....धरम - संसकीरती और देश के चिंता का समय है ....। "
" देशे के बात तो हम भी कर रहे हैं भइया ....मजदूर, किसान, स्त्रियां, नौजवान ई कुल देश मे न आता है ....गरीब लोग भूख से मरेंगे ....बेरोजगार नौजवान हताशा-निराशा में नशाखोरी करेगा ....किसान आत्महत्या करेंगे.... स्त्रियां घर से निकलने में डरेंगी ...बच्चे कुपोषण से मरते रहेंगे ...तो का देश मजबूत हो जाएगा ....इनकी चिंता करना देश की चिंता करना नहीं है ? "
" अब देख , तू लगा राजनीति बतियाने... कुछ देर में कहेगा कि ई सब मोदीजी के कारण हुआ है ....उनके हटते सब दुरुस्त हो जाएगा ....तो तू ही बताओ ई कुल समस्या ईहे पाँच साल में खड़ा हुआ है ? "
" ई हम कहाँ कह रहे हैं.... ई कुल उन्हीं नीतियों से उपजा है , जे पिछले पचीस - तीस साल से लागू हुआ है ....कोढ़ में खाज ई है कि ई आके ओकरा में एगो धरम और संसकीरती के बात जोड़ दीहिन ...ई से हुआ यह कि असली मुद्दा गायब हो गया....।"
" गायब नहीं हुआ.... बल्कि सामने आ गया ...देशे न रहेगा ...हमरा धरमे- संसकीरती न बचेगा , तो हम जी के का करेंगे ...! और सुन अभी सारा देश मोदीजी के तरफ टकटकी बाँधे देख रहा है ....लोग जानते हैं कि ई डूबइत नाव के ऊहे बचायेंगे ....। "
" ई आपको भरम है भइया ....सारा देश गुस्सा में खदबदा रहा है ...इनकर नाव डुबने ही वाला है ....सबके आँख खुल गया है....जौन तरह से सबके लुट के ई चार गो के घर भर रहे हैं , सबलोग देख रहा है....बैंकन को बरबाद कर दीहिन.... खेती को चौपट कीहीन ....सरकारी कल-करखाना एक एक करके बेच रहीन है....जंगल - पहाड़ अपने लगुओ - भगुओ को दान कर रहीन है ...जनता सब देख रही है .....।"
" दुर भकचोन्हर ...तो जे है सो सामने ही आ जाएगा... ऊ का कहते हैं ...हाथ कंगन के आरसी का .... हर हर मोदी....।" कहते हुए पांडे उठा और चल दिया ।
मनुआ ने हँसते हुए कहा  -- " बाबूजी ! ई न सुधरेंगे ....मारकस बाबा ने झूठो न धरम को अफीम कहा है ....। "
" इतना ही नहीं , और भी बहुत कुछ कहा है .... ।" -- कहकर मैं मुस्कुरा दिया ।

Comments

Popular posts from this blog

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

पहचान की राजनीति

## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।  यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...