अब शायद मनुआ निराशा से बाहर आ गया होगा , सोचकर कल मैं मनुआ के घर गया । देखा जाये , तो बात निराशा की है भी । इस बार के चुनाव का परिणाम भारी चौंकाने वाला रहा है । ऐसे परिणाम की आशा किसी ने नहीं की थी ।
जब मैं पहुंचा , वह पांडे और रघु काका से बारी बारी उलझ रहा था । पांडे उसकी दुखती रग पर हाथ रख देता और वह बिफर जाता ।
" देखा ...तू मानबे नहीं करता था .... बंगालो में आ गया न ....और तुमलोगों का सूपड़ा साफ....हा ...हा....हा...।"
" जो हुआ है पांडे भइया ...ऊ तो हमहुँ मान रहे हैं ...बाकि कइसे हुआ ...यही न न बूझ रहे हैं....। एगो बंगाले के.बात न न है ...दो तीन स्टेट छोड़ दीजिए , तो सब का यही हाल है ....ई तो लगता है कि आँख बंद और डब्बा गोल .....।"
" बस तू लोगन के एही बात. हमरे समझ से बाहर है ...जब जीते , तो ईभीएमवा ठीक और हारे तो.....। "
" लो , चोर के दाढ़ी में तिनका ....ई तो हम कहबो न किये हैं ....बाकि ई बताइए कि चुनाव के घोषणा से लेके और चुनाव के रिजल्टवा निकले तक चुनाव आयोग इनके पक्ष में काम कीहीस है कि न ...?"
" दूर बुड़बक , ई कौनो नई बात है ....अरे जेकर सरकार रहती है , ओकर परभाव सब जगह रहता हीं है....बाकि मोटा भाई के बुद्धि और मेहनत भी तो देखो ....।"
" देख रहे हैं भइया , झूठ के बड़का मशीन हैं....अकूत धन के बदौलत समूचे मीडिया के खरीद लीहिन और मुफत में गैस चूल्हा , संडास , घर आदि देवे के साथ साथ किसान सब के खाता में दो हजार , आयुष्मान हेल्थ जोजना आदि के जम के परचार कीहीन ....ऊपर से सेना और राम जी के भी जम के इस्तेमाल कीहीन ....भरम फैलावे में सफल रहीन , ई तो हम मानबे करेंगे ...। "
" अरे , तू का मानेगा ...दुनिया इनका लोहा मान रही है ...अईसहीं न अमेरिका और चीन के सरकार मोदीजी के फिर चुन के आवे पर बधाई दीहीस है ....।"
" ऊ लोग तो खुश होयबे न करेगा भइया ....अमेरिका के कहे पर हमरी सरकार ने ईरान से तेल लेना बंद कर दिया , जे कि हमको अप्पन रुपया में मिलता था और अब दोसर देश से हम डालर में महंगा तेल खरीदा करेंगे...अमेरिका अप्पन फायदा ला हमरा इस्तेमाल कर रहा है ...तो खुश होयबे करेगा ...और चीन को भी हम्मर मारकिट के दरकार है , तो ऊहो तेल लगयबे न करेगा ....बाकि हमलोगों को का मिलेगा... चूल्हवा के पइसवा धीरे धीरे सबसीडिया में से काटियो लेगा और कहेगा कि मुफते दिये हैं ....हम मजदूरों को 18000/- महीना कम से कम देने के लिए सुपरीम कोरट कहीस , लेकिन.....।"
" ऊ सब मिलेगा... ई पाँच साल में सब करेगी ई सरकार ...।"
" आ नहिए करेगी , तो हम का कर लेंगे ...श्रम कानून सब बदल दीहीस तो हम का कर लिये ....ऊपर से बम्फर सपोर्ट कर दिये..... और आपको का है भइया ....आज से 30 साल पहिले हमलोग हीयाँ करखाना में काम करे आये थे ....धीरे धीरे करखाना का चमक घटता गया और डेगे डेगे चमचमाइत मंदिर बनता गया.... आपको तो का है ....ओने से छूटे...एने लग गये ....फिकिर तो हमनी के है .... का रघु काका ? "
रघु काका अचकचा के दूनो का मुंह देखने लगे । बोलते तो का बोलते । जात के पंचायत के फैसला के कारण ऊ भी तो कमले फूल पर बटन दबाईन थे । बीच में पिसाय से अच्छा चुपेचाप निकल लेना बेहतर समझे ।
" अरे , हमरा तो तू बात में फंसा दिया रे मनुआ ...जारहे थे सेक्टर से पानी लेने और तू .....।"
"पानी ! का काका , बोरिंगवा फेल हो गया का....? देख पांडे भइया , ई स्थिति है निगम क्षेत्र का ....जब पीने का पानी न है , तो संडास में पानी कहंवा से लोग डालेंगे ?"
" दुर बकचोन्हर , का चाहता है कि सब कुछ के जिम्मा सरकार ले ले ....कुछ अपने भी लोग इंतजाम करेंगे कि नहीं ....हमलोगों को ऊ का है न कि मुफतखोरी के आदत हो गई है ....।"
" हँ , आप तो कहबे न करेंगे ....आप तो मेहनत के कमाई खाते हैं ....ठेलवा खींचे से जादे मेहनत घंटिए बजाने में न है ....और मुफतखोरी इसे मत कहिएगा.... दुनियाभर के टैक्सवा जे हमलोग देते हैं न ...ओतनो सरकार हमलोगों के लिए नहीं करती है ।"
" अब का करती , बोलो.....एक - दो रुपये अनाज दे रही है , कुल स्कूलन के लड़िकन के जामा - कपड़ा ...मुफत में दुपहर का खाना....बीमारी में आयुषमान जोजना से पाँच लाख तक ईलाज.... मुफत में चूल्हा , घर ...और का देती ...।"
" चूल्हवा का तो नामे मत लीजिए ..ऊ मुफत में नहीं है ....बाकी जो बता रहे हैं , ऊ कुल बजट का हेराफेरी है ....सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में भारी कटौती करके उधर मुफत खाना और इधर आयुष्मान जोजना चला रहे हैं.... स्कूल में पारा शिक्षक...हस्पताल में टम्पोररी डागडर ....कहीं कहीं ऊ हो न , खाली नर्स - कंपाउंडर ....दवाई नदारथ ....एने से काटके ओने जोड़के ढिंढोरा पीट रहे हैं ....।"
" अरे , बस कर ....तू ही तो एक ठो गियानी है ....बाकि सब बुड़बक है ....ईहे से न जनता तू लोगन को नकार रही है ....भक भक ऊगल इंजोरियो को तू लोग अन्हरिया कहता है ...लोग पागल हैं , जे एतना भारी वोट से जिताईन है ...।"
" पागल नहीं भइया , भरमित हैं....जाति-धरम का परदा अँखिया पर पड़ गया है...परचार- दुसपरचार के चकाचौंध से भी भरमा गये हैं.....अप्पन हक और अधिकार भुला के आप लोगन द्वारा खड़ा किया हुआ नकली दुशमन के पीछे भाग रहे हैं.....लेकिन सुन लीजिए ...जिस दिन इनके अँखिया परसे परदवा हट जाएगा न ....ई सिस्टम और सरकार के खिलाफ खड़ा हो जायेंगे.....।"
" ई सुन ...! ऊ परदावा हटाएगा कौन हो...? .....तुमलोग ! हा....हा....हा...! पहिले तुमलोग अप्पन अस्तित्व तो बचाओ ...विलोप होते जा रहे हो ..हा...हा....! " कहते हुए पांडे उठा और चल दिया ।
मनुआ का चेहरा तमतमा गया । उसनें ऊँची आवाज में कहा --- " हाँ , भइया ....हम ही लोग हटायेंगे ....हम चुनाव भले हारे हैं ...पर हिम्मत नहीं हारे हैं । हम सड़क पर थे , हैं और रहेंगे .....।"
मैने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रख दिया और कहा ---- " गुस्सा नहीं मनुआ , प्रतिकूल परिस्थितियों में घैर्य और साहस से काम लेना चाहिए । किसी ने ठीक ही कहा है कि नदी की धारा के साथ तैरने में कौन सा पुरुषार्थ , पुरुषार्थ तो धारा के विपरीत तैरने में है ....जो हम कर रहे हैं । "
उसने सिर हिलाकर मेरा समर्थन किया और धीरे से मुस्कुरा दिया ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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