परंपरागत रूप से हम दक्षिणपंथी संस्कारों के साथ बड़े होते हैं । वैज्ञानिक चेतना से टकराने के बाद हममें से कुछ लोग इसे अंगीकार करते हैं । शेष या तो उसी संस्कार में और भी लिप्त हो जाते हैं या कुछेक मध्यमार्गी हो जाते हैं ।भाववादी दर्शन और भौतिकवादी दर्शन का यह विवाद सदियों पुराना है और अब तक हमने यही देखा है कि पहले वाला ही जीतता रहा है ।वैज्ञानिक उपलब्धियों का इस्तेमाल भी वे बड़ी ही खूबसूरती से अवैज्ञानिकता फैलाने में कर लेते हैं । इसके लिए उन्हें पूंजी और सत्ता दोनों का समर्थन प्राप्त होता है । इधर जो चंद लोग अंधविश्वास / अंधश्रद्धा उन्मूलन का प्रयास करते हैं , उन्हें चार्वाक की ही तरह समूल नष्ट करने का प्रयास होता है वा समूल नष्ट कर दिया जाता है ।
बड़ा ही कठिन संघर्ष है ।फिर भी जारी है और भविष्य में भी जारी रहेगा । हमें अपनी क्षमता के अनुसार इस संघर्ष में योगदान देना है । हार से सबक लेते हुए आगे की रणनीति बनानी है । हमारे संघर्ष में हताशा और निराशा के लिए कोई जगह नहीं होना चाहिए।
आइए , किसी जादूगर का इंतजार करने की बजाए अपने सीमित संसाधनों और क्षमताओं को इस संघर्ष में लगाएं । इस आह्वान के साथ कि आनेवाला कल हमारा है ।
#हार_यदि_हौसला_दे_तो_जीत_अवश्यंभावी_है
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