हम हत्यारे हैं
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तुम्हारी टूटती साँसों के बीच
झूलती रही
यह जर्र-जर्र व्यवस्था
कई कई दिनों तक
सूनी होती रही गोद
आँसुओं से होता रहा तर-व-तर
दुखियारी माँ का आँचल
अस्पताल की पाषाण दीवारों से
टकराती रहीं माँ की चीखें
जो नहीं पहुँच सकीं
राजधानियों तक
कई कई दिनों तक
दीपक बुझते रहे
और छोड़ते रहे सवाल
स्याह पड़ते होठों पर
फटी-फटी ज्योतिहीन आँखों में
तैरते रहे सवाल
सवाल,
जिनके जवाब की खोज ने ही
दिया है जन्म
नई सभ्यताओं को,
जिनसे टकराकर ही
पनपीं हैं
कई - कई संस्कृतियाँ,
जिनके कारण ही
पाई है हमने
कई नई
वैज्ञानिक उपलब्धियाँ
आज उन्हीं सवालों से
भागते हैं हमारे रहनुमा
सवाल पूछना
हो गया है देशद्रोह
पर, हमारे बच्चे !
तेरे हर सवाल का
देना होगा हमें जवाब
हमें,
जिसने छीना है
तेरे होठों की हँसी
आँखों के मासूम सपने
तेरे हिस्से की हवा,पानी
और रोशनी
हमें,
जिसने छीना है तुमसे
फूलों के रंग
भौंरों की गूंजन
कोयल की कूक
मोर के पंख
तितलियाँ -गोरैए
चील और कौए
हमें,
जिसने छीनी है
अल्पायु में ही
तुम्हारी साँसें ,
हमारे बच्चे !
हम
पूरे होशोहवास में
करते हैं कबूल
कि...हमने ही की है
तुम्हारी हत्या,
हम हत्यारे हैं वत्स !
हम.... हत्यारे.....हैं !!
----- कुमार सत्येन्द्र
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