मैं मनुआ के साथ बैठकर अगले दिन होनेवाले युनियन कार्यक्रम की तैयारी के संबंध में चर्चा कर ही रहा था कि दूर से पांडे आता दिखाई दिया । आज उसके चेहरे पर छः इंचिया मुस्कान थी और 30 इंच की छाती फैलकर 56 इंच की हो रही थी । वह लंबे लंबे डग भरते हुए हमारे पास पहुंचा। मनुआ ने दुआ सलाम के बाद हँसते हुए पूछा -- " का हो पांडे भइया , बड़ा खुश नजर आ रहे हैं... कौनो लॉटरी लगी है का.....कि प्लांटवा की नौकरिया परमामिंट हो गई ? "
" दुर बुड़बक , तू कुइयाँ के बेंगे है अभीतक... अरे , ओकरो से बड़का काम साहेब कर दिहीन है..... कश्मीर के सब समस्या एके झटका में स्वाहा... और कश्मीर के दू टुकड़ा करके भारत में हमेशा हमेशा के लिए मिला लिहीन ...।"
" अच्छा ! ...तो पहिले ऊ भारत में न था का भइया ? "
" अरे , ऊ में कै ठो फालतू के पेंच था ....ऊ का कहते हैं ...एक ठो 370 धारा था...सब को उड़ा दिहीन और ओके पूरा राज्य से केंद्रशासित प्रदेश बना दिहीन ...एक ठो और कौनो धारा था , ओकरा साफे उड़ा दिहीन... ई से हुआ है ई कि अब कोई भी ऊहाँ जाके जमीन खरीद सकता है और बस सकता है ।"
" अच्छा ! हमलोग भी ?"
" अरे हँ रे , हमलोग भी ....।" पांडे ने चहकते हुए कहा ---" इतने नहीं , अब ऊहाँ की लड़की की शादी बियाह हियाँ के लड़िकन से होने में कोई दिक्कत नहीं रहा ...।"
" अच्छा, तो रमेश बबुआ के बियाह ऊँहईं करने का विचार है का ? "
" अरे नहीं , तुम तो जानते हो कि हमलोग कान्यकुब्ज ब्रह्मन हैं , दोसर ब्रह्मन में बियाह नहीं करते हैं , तो कश्मीरी पंडितों ......लेकिन एक बात तो है कि बियाह करे से जो ऊहाँ के लड़कियों को राज्य का अधिकार नहीं मिलता था , सो तो मिलेगा ।"
" ई बात तो हिमाचल प्रदेश के भी कुछ इलाके में होता है भइया , और हिमाचल सहित कई राज्यों में बाहरी लोगन के जमीन खरीदने पर रोक है .....ऊ का कहते हैं ...धारा 371 के तहत ....।"
" दुर बुड़बक , ई दोनों के बीच फरक को काहे न समझते हो .....ई सब भारत के साथे हैं और ऊ हमेशा अलगे भागने की बात करता था ....।"
" अच्छा ! इसीलिए नागालैण्ड जाने के लिए स्पेशल परमिट लेना पड़ता है ! "
" अब तुमलोग कुछो कहो , जनता सरकार के ई कदम से गद् गद् है, मार चारो ओर जशन मनाया जारहा है ...पटाखे फूट रहे हैं ...बाकि तू वामपंथी लोग नहीं बूझ रहा है कि देश हित में केतना बड़ा काम हुआ है...का तुमलोगों ने आत्महत्या करने को सोच लिया है का ? "
" नहीं भइया , हमलोग संविधान , संघीय ढाँचा और लोकतंत्र को बचाने का प्रयास कर रहे हैं ...जो कुछ संसद में हुआ , ऊ असंवैधानिक है ....अलोकतांत्रिक है ....और संघीय ढाँचे पर करारा प्रहार है.....।"
" का बात करते हो , यदि ऐसा होता तो राज्यसभा में ई बिल कैसे पास होता ....ऊ भी दू तिहाई बहुमत से .....।"
" बहुमत का फैसला हमेशा सहिए न होता है भइया.... और जहाँ साम-दाम-दंड भेद सब चलता हो , तो कहना ही का है । पर आप ही बताइए आजतक कभी सुने थे कि राज्य की जनता के बिना सहमति के राज्य को बाँट दिया गया ....इतना ही नहीं , ओके दरजा घटाके केंद्रशासित प्रदेश बना दिया ....? "
" इसीलिए न कहते हैं कि मोदी है तो मुमकिन है ....हा...हा....हा....!"
अचानक कुछ नौजवान लड़कों के आने से व्यवधान पड़ गया । पांडे और मनुआ उनकी ओर देखने लगे ।लड़के शायद उनके ही गाँव के थे ।लड़कों ने आकर दोनों को दंड-प्रणाम किया ।
मनुआ ने उन्हें बैठने को कहा और एकाएक एक साथ आने का कारण पूछा ।
" भइया , हमसभिन टाटा में छोटेछोटे फैक्टरी में काम करते हैं ....अब हैं का कहें...करते थे , कल अचानक से फैक्टरिया बंद कर दिया गया और हमसभन के छुट्टी कर दिया .....।" -- एक लड़के ने रुआंसा होकर आने का करण बताया ।
पांडे को ताव आ गया ---" अरे , काहे सरकार को तुमलोग बदनाम कर रहे हो , ऐसा कैसे हो सकता है ....न न सरकार कभी भी ऐसा नहीं होने देगी ....।"
" का बात करते हैं चाचा , अपने बीएसएनएल कर्मचारियों को तो सरकार तनखाह नहीं दे पा रही है , छँटनी करने जा रही है और पराइवेट वालों को बचाएगी ! "--- एक लड़के ने चिढ़कर पांडे को जवाब दिया । पांडे ने खिसकना ही उचित समझा और लगभग बुदबुदाते हुए कहा ---- " हमरा मंझिला भी तो टटे में है ....ऊहो आ रहा है का ...नहीं.... नहीं.... ऐसा न होगा ....।"
" का हुआ पांडे भइया , चेहरा पर बारह क्यों बजने लगा ? अरे , जशन मनाइए.... पटाखा छोड़िए..... अरे भइया , ई कॉरपोरेट का सरकार है , ई जो भी कर रही है उनके फायदे के लिए कर रही है ....हमलोग तो बेकारे उनके इशारा पर नाच रहे हैं.....देखे , कहीं पे निगाहें , कहीं पे निशाना .....हा....हा...हा...भइया , मोदी है तो .....मुमकिन है.....हा...हा...! "
"ई होगा , तो बहुते गलत होगा ...." ---कहते हुए पांडे उठा और चल दिया । मनुआ अपने गाँव के लड़कों से बतियाने लगा । माहौल एकाएक काफी गंभीर हो गया ।
## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है। यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...
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