वर्षों से हम माटी के
दीये बनाते रहे
तेल की जगह
अपने खून से जलाते रहे
रात - रात भर जलती रही
दीया - बाती
पर , पता नहीं क्यों लक्ष्मी
हमारे घर नहीं आती ?
सदियों से पीट पीट कर सूप
माताएं दलिद्दर को भगाती हैं
रात भर जगकर लक्ष्मी को
अपने घर बुलाती हैं
पर , महलों में बंद लक्ष्मी
कैसे आयें,
वहाँ तो दरवाजे पर
बख्तरबंद पहरे हैं,
दलिद्दर लौट आता है पुनः
उन्हीं झोंपडियों में
जहाँ वर्षों से उसके पुरखे ठहरे हैं
कहते हैं मिहनत का फल
मीठा होता है
पर पता नहीं क्यों ,
हम मेहनतकशों के घर
सदा अँधेरा होता है
सदियों से हम उजाले की
आस में बैठे हैं
भाग्य और भगवान पर
विश्वास कर बैठे हैं
अपने अंदर छिपी शक्ति
पहचानते नहीं
हम ही संचालक हैं विश्व का
यह जानते नहीं,
जिस दिन यह दिव्य ज्ञान
हमें हो जाएगा
एकता के बल को हम
पहचान जायेंगे
एक नया सूरज निकलेगा
हमारे आँगन में
फैलेगी रोशनी
हमारे भी जीवन में ।
------- कुमार सत्येन्द्र
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