वर्षों बाद उस दिन
हँसा था रामदास
जागा था उसका भाग्य
वर्षों बाद
बना था वह
सेवक से कारसेवक
दलित-दमित शुद्र
शंबूक का वंशज
जो आजतक
नहीं चढ़ पाया
नाथद्वारा की सीढ़ियाँ
हो गया था अचानक
अति बहुमूल्य
खड़ा था पंक्ति में
शंकराचार्यों - वामदेवों की
मनुस्मृति के नियमों के प्रतिकूल
उत्साहित , उल्लसित थामे हुए
भगवा झंडा और त्रिशूल
आह्लादित रामदास
चाहता था चूमना
उन हाथों को
पूजना उन बाहों को
जो ढाह गिराए थे
उस पुराने ढाँचे को
किंतु जब देखा उन्हे
रह गया आवाक्
जड़वत निहारता रहा
उनके रंग-गंध
पहचाने से थे
ये वही हाथ थे
जिन्होने
कभी डाला था
पिघला सीसा
उसके कानों में
उस ने पहचाना
उन नाखूनों को
महसूसा अपने जिस्म में
उनकी चुभन
एक चिर-परिचित दर्द उठी
उसकी रीढ़ की हड्डियों में
और तब
राम दास की हँसी
उस के गले के बीच फँसी .
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