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सामाजिक - सांस्कृतिक संकट और बुद्धिजीवियों की भूमिका ।

 बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने देश का संविधान सौंपते हुए कहा था --- " 26 जनवरी,1950 को हम अंतर्विरोधों से भरे जीवन में प्रवेश कर रहे हैं । राजनीति में हम समानता का सिद्धांत अपना रहे हैं , जबकि सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी । राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट और एक वोट एक मूल्य के सिद्धांत पर चलेंगे। किंतु , सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में अपने सामाजिक और आर्थिक ढ़ांचे के कारण एक मान / मूल्य के सिद्धांत को नकारेंगे । इस तरह के अंतर्विरोधों से भरा जीवन हम कबतक जीते रहेंगे ? हम कबतक सामाजिक और आर्थिक असमानता को नकारेंगे ? यदि हम इन असमानताओं को लंबे समय तक नकारते रहे, हम अपने जनतंत्र को नाश के कगार पर पहुंचा रहे होंगे ।"
                           उनकी इस चेतावनी के बावजूद हमारे समाज में सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएं न केवल विद्यमान है ,बल्कि इनकी खाईं और भी चौड़ी होती जा रही हैं ।आजादी के 70 वर्षों के बाद भी हमारा समाज जातीय खानों में बँटा हुआ है । जातीय विद्वेष बढ़े हैं । जातीय हिंसा बढ़ी है । जात - पाँत , छुआछुत की अवधारणा ने और भी मजबूती से समाज को अपने गिरफ्त में ले लिया है ।जाति के नाम पर न केवल राजनीतिक दल बने हैं , बल्कि जातीय गौरव की रक्षा हेतु जाति आधारित सेनाओं का गठन भी हुआ है ।पिछले कुछ वर्षों में इसमें तेजी भी आई है ।दलितों पर हमले तीब्र से तीब्रतर हुए हैं ।
        किंतु , इस बीच कुछ सकारात्मक बातें भी हो रही हैं ।यथास्थिति टूट रहा है ।शोषित और दलित जातियाँ खामोश रहकर अब और अत्याचार सहने को तैयार नहीं हैं ।प्रगतिशील एवं जनवादी संगठनों ने भी सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ इनके आंदोलनों में सहयोग करना शुरू कर दिया है । ऊना और शब्बीर पुर  की घटनाओं और उसके विरोध में हुए आंदोलनों , रोहित वेमूला की संस्थागत हत्या के बाद उठी विरोध की आवाज और महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में वीर महार सैनिकों द्वारा पेशवाओं पर हुई विजय की 200वीं वर्षगाँठ के अवसर पर आयोजित समारोह में ब्राह्मणवादी और संघी संस्थाओं द्वारा किये गए हमले और प्रत्युत्तर में पूरे महाराष्ट्र में हुए दलितों - शोषितों के विराट विरोध प्रदर्शनों एवं सफल महाराष्ट्र बंद ने यह साबित कर दिया है कि अब शोषित - दलित जातियाँ सामाजिक गुलामी की जंजीरों को पूरी तरह तोड़ देने को कृतसंकल्प हैं ।हो सकता है कि कुछ लोगों की नजर में ये घटनाएं नकारात्मक और समाज को विखंडित करनेवाली लगती हों । किंतु , दरअसल में ऐसा नहीं है ।अपने हक और हकूक के लिए इन वंचित तबकों का उठना एक सकारात्मक परिघटना है और यदि सामाजिक न्याय की इस लड़ाई के साथ आर्थिक समानता की लड़ाई को भी जोड़ दिया जाए , तो शायद हम उस मुकाम को हासिल करने में सफल हो सकते हैं , जिसका जिक्र बाबासाहेब ने अपने उद्बोधन में किया था ।राजनीतिक समानता के साथ जब सामाजिक और आर्थिक समानता कायम होगी , तभी हम सही अर्थों में जनतंत्र को कायम और सुरक्षित रख पायेंगे।
हमारा देश एक बहुभाषी, बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक देश है । जितनी विविधता हमारे देश में है , उतनी शायद ही किसी और देश में होगी ।इन विविधताओं के बावजूद हमारी एकता , अखंडता और संप्रभुता अक्षुण्ण रहने का कारण है , आजादी के संघर्ष के दौरान अर्जित किये गए वो मूल्य , जो हमारे संविधान के प्रस्तावना में दर्ज हैं । स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा , वे मूल्य हैं , जो हमें एकता की मजबूत सूत्र में बाँधते हैं । औपनिवेशिक शासन से मुक्ति का संघर्ष बहुआयामी था ।राजनीतिक गुलामी के साथ साथ सामाजिक एवं आर्थिक गुलामी को भी चुनौती दी जा रही थी । मुक्ति संघर्ष का मूल स्वर भारतीय समाज को सभी तरह की गुलामियों से मुक्ति का था । एक नये समाज के निर्माण का था । एक ऐसे समाज के निर्माण का था , जो धर्मनिरपेक्षता, समानता और भाईचारे की मजबूत नींव पर खड़ा हो । यह वही दौर था , जब प्रेमचंद "सवा सेर गेहूँ ", "पूस की रात ", "ठाकुर का कुआँ", "कफन " जैसी कहानियां और "कर्मभूमि", "रंगभूमि", "निर्मला", तथा "गोदान" जैसे उपन्यास लिख रहे थे । 
निराला "वह तोड़ती पत्थर","भिक्षुक","कुकुरमुत्ता","चतुरी चमार" और "विल्लेसुर बकरिहा" जैसी कालजयी रचनाएँ लिख रहे थे । रवीन्द्र नाथ टैगोर और नजरूल इस्लाम अपने गीतों - संगीतों के माध्यम से मुक्ति गाथा की रचना कर युवाओं में नया जोश भर रहे थे । अलामा इकबाल और फैज अहमद फैज देशभक्ति के साथ ही मजदूरों की मुक्ति के तराने लिख रहे थे । स्वामी सहजानन्द सरस्वती न केवल "किसान ही भगवान है " का उद्घोष कर रहे थे , बल्कि उन्हें संगठित कर जमींदारों की जुए से मुक्त करने का आंदोलन भी चला रहे थे ।तात्पर्य यह है कि राजनीतिक नेताओं को उस वक्त के बुद्धिजीवी और साहित्यकार अपने लेखों और रचनाओं के माध्यम से यह संदेश दे रहे थे कि आजादी के बाद राज्य का स्वरूप क्या होगा । वे एक नये समाज की रूपरेखा प्रस्तुत कर रहे थे । नये भारत का आधार क्या होगा , इस ओर इंगित कर रहे थे । और जब देश स्वतंत्र हुआ , तो उन्हीं विचारों के आलोक में बाबासाहेब की अध्यक्षता में गठित संविधान सभा ने देश को एक ऐसा संविधान दिया , जिसकी बदौलत हमारे देश में जनतंत्र की एक मजबूत नींव पड़ी । ध्यातव्य हो कि एशिया और अफ्रीका के कई देशों को ठीक उन्हीं दिनों औपनिवेशिक दासता से मुक्ति मिली थी , किंतु उनमें से अधिकांश में या तो जनतंत्र की हत्या हो चुकी है या वह लुंजपुंज अवस्था में है ।
 पिछले कुछ वर्षों से हमारे इन्हीं मूल्यों पर लगातार प्रहार किये जा रहे हैं । संविधान के मूलभूत आधार को तोड़ने की सचेत कोशिश की जा रही है ।साम्प्रदायिक शक्तियों के उभार ने हमारे सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक तानेबाने को छिन्न - भिन्न करने का काम किया है । सदियों से चली आ रही साझी संस्कृति , गंगा - जमुनी तहजीब आज खतरे में पड़ी दिखाई दे रही है ।संविधान की शपथ खाने वालों द्वारा ही संविधान का खुला उल्लंघन किया जा रहा है ।लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण और अपहरण हो रहा है । पूंजीवाद और सामंतवाद के गठजोड़ ने साम्राज्यवाद के साथ मिलकर देश के संसाधनों का अंधाधुंध दोहन शुरु कर दिया है । एक तरफ सार्वजनिक संपत्तियों को औने-पौने दाम में निजी कंपनियों को सौंपा जा रहा है , उन्हें लूट की पूरी छूट दी जा रही है , तो दूसरी तरफ श्रम कानूनों में बदलाव कर श्रमिकों के अधिकारों में कटौती की जा रही है । बेरोजगारी अपने चरम पर है । किसानों की हालत अति दयनीय है । वे प्रतिवर्ष सैंकड़ों की संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं । लोगों की आय में कमी के कारण क्रयशक्ति में बेइंतहा ह्रास हो रहा है । देश की अर्थव्यवस्था बहुत ही जर्र - जर्र अवस्था में है । जनता का ध्यान इस ओर से हटाने के लिए धार्मिक उन्माद फैलाने की चेष्टा की जा रही है । सामाजिक न्याय की लड़ाई अधूरी रह गई है और उसका विकृत रूप जातीय हिंसा के रूप में हमारे सामने है । उच्च शिक्षण संस्थाओं पर सुनियोजित हमले हो रहे हैं , ताकि उनका निजीकरण किया जा सके । सरकार की नीतियों के विरोध को देशद्रोह की संज्ञा दी जा रही है । वैज्ञानिक चेतना को कुंद कर धार्मिक अंधविश्वास और पाखंड फैलाया जा रहा है ।ऐसे में बुद्धिजीवियों एवं साहित्यकारों की भूमिका और  जिम्मेदारी कई गुणा बढ़ जाती है । समाज में बढ़ती सभी तरह की विषमताओं , मूढ़ताओं और घातक रूप से बढ़ रहे नफरत के खिलाफ जन चेतना जाग्रत करनेवाली रचनाएँ लिखना , उन्हें प्रचारित - प्रसारित करना और लोकतंत्र तथा संविधान प्रदत्त जनवादी अधिकारों पर हो रहे हमले को विफल करने के लिए जन आंदोलनों के निर्माण में सहयोग करना आज की खास जरूरत है । 

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