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दंगा

* दंगा *

वक्त का है फेर
कहते हैं लोगबाग

बड़ा ही भयावह 
मंजर था 
जैसे उलट - पुलट गया था
सब कुछ 
मिट गया था फर्क 
शहर और जंगल का
आदमी और भेड़िए का ,
भेड़िए भी अब शहरी थे.

बदल गया था रंग
पानी का 
वह था अब
सूर्ख लाल
और खून 
पानी बन चुका था

सबकी आँखों में 
उतर आया था खून
जिसमें दफ्न हो गए थे 
सबके सुनहरे सपने

सारी ख्वाहिशें
चढ़ चुकी थी भेंट
बस एक नारे की 
जो गूंज रहा था
शहर से जंगल तक
और जंगल से शहर तक

ख्वाहिशों के कब्र पर
उग आए थे 
नागफनी के जहरीले पौधे
बच्चों के नीले पड़े
लहूलुहान जिस्म पर
रखी जा रहे थी
मजहब की बुनियाद

इतनी तेज चली थी आँधी
कि उड़ चुके थे सबके वस्त्र
सब हो चुके थे नग्न
भेड़ियों की आँखों में थी चमक
होठों पर विजयी मुस्कान 
वर्षों के अथक प्रयास से
हराया था उसने 
आदमजात को

वक्त का है फेर 
कहते हैं लोगबाग
पूंजी का है खेल 
कहता हूँ मैं .

----- कुमार सत्येन्द्र

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