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कोरोना

कोरोना

हे कोरोना !
तू भयानक है
और साथ ही उद्दंड भी
अचानक ही टपक पड़े
यमराज की तरह
न दिया मौका किसी को
पूजन सामग्री जुटाने का
पुआ - पकवान बनाने का
तुम्हें मनाने - फुसलाने का

तेरा तांडव देख
काँप उठी धरती
हिल उठी
महलों की बुनियाद
ऐसा मचा कोहराम
कि मौत के सौदागर भी बोले
त्राहिमाम ! त्राहिमाम !

तेरा चरित्र भी 
गजब है यार !
दुश्मनों से ज्यादा
दोस्तों पर करते हो वार
 मिलते -- मिलाते हाथों से
चिपक जाते हो 
चुपके से इससे उसमें
उससे इसमें
घुस जाते हो 
कर देते हो छलनी
बेचारे फेफड़े को

इतना ही नहीं
काट रहे हो खूब बवाल
बड़े - छोटे का भी
 नहीं करते ख्याल 
अमीर हो या हो फटेहाल
सब पर चलते हो 
बस एक ही चाल
और इसी का तो है 
उन्हें मलाल
न गलने दे रहे तुम 
उनकी भी दाल

वरना ,
दस मिलियन खाकर प्रतिवर्ष
जिंदा है कैंसर
तीन मिलियन नौनिहालों को
प्रतिवर्ष जबड़े में दबाकर
सुरक्षित है कुपोषण
भूख तो सुरसा की भाँति
फैलाती है मुँह
निगल जाती है लाखों लाख
फिर भी बची है उसकी साख 

अतः , हे कोरोना !
अपने सारे सगों की सुन
आजमाए हुए उनके
रास्ते को चुन
और फिर , 
चिरकाल तक
इस अनुपम ग्रह पर
बने रहो तुम
सदा ही अक्षुण्ण !

----- कुमार सत्येन्द्र

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