Skip to main content

कम्युनल वायरस

कम्युनल वायरस
**************
कमरे में बैठा आज का अखबार उलट - पलट रहा था कि मेरी बारह वर्षीय पोती ने कमरे में दबे पाँव प्रवेश किया । आहट पाकर मैंने उसकी ओर देखा । इधर उधर देखते हुए उसने बहुत ही धीमे स्वर में कहा -- " दादा जी ! क्या आप अपना मोबाईल दो मिनट के लिए देंगे ? "
" क्यों ....अपनी मम्मा से ले लो ! "
होठों पर ऊँगली रखते हुए उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा ---" स्सी....धीरे बोलिए दादा जी ...! आप नहीं जानते .....मम्मा नहीं देंगी ....। आप दो न ...प्लीज ! " 
" क्या करना है ? गेम खेलोगी ? "
" नहीं दादाजी , अपनी सहेली नीतू से बातें करनी है ...कई दिनों से हमारी बातचीत नहीं हुई है । "
उसके स्वर में एक तड़प थी। बेचैनी थी ।
मैने मुस्कुराते हुए मोबाईल उसकी ओर बढ़ा दिया । उसने लपक कर लिया । उसका चेहरा खुशी से खिल उठा । वह उसी तरह दबे पाँव अपने कमरे में चली गई ।

 तब उसकी माँ कीचन में व्यस्त थी ।

आज तकरीबन 30 दिनों से पूरे देश में लॉकडाऊन चल रहा है । स्कूल , कॉलेज , कल - कारखाने , सरकारी एवं निजी प्रतिष्ठान , अतिआवश्यक सेवाओं को छोड़कर , सभी बंद हैं । अचानक हुए लॉकडाऊन से जो जहाँ था , वहीं फँसा हुआ है ।कोरोनावायरस ने पूरी दुनिया को जेलखाने में तब्दील कर दिया है । तीन महीने से दुनिया के हजारों वैज्ञानिक इसकी दवा या वैक्सीन ईजाद करने में लगे हुए हैं । पर , अभी कोई सफलता नहीं मिली है । इस खतरनाक बीमारी ने अबतक लगभग दो लाख लोगों की जानें ले ली है । करोड़ों लोग संक्रमित हैं । अखबार में रोज रोज ऐसी खबरों को पढ़ - पढ़कर ऊब और खीझ होने लगी है । 
मैं अभी इसी उधेड़बुन में था कि पोती ने पुनः कमरे में प्रवेश किया । जाते समय जो खुशी उसके चेहरे पर थी , वापस लौटी तो वह गायब थी। 

फोन वापस करते हुए उसने पूछा --- " दादाजी ! क्या  कोरोनावायरस पूरी दुनिया में चीन ने जानबूझकर फैलाया है ? "
" जानबूझकर ! ऐसा कोई करता है बेटा ? हाँ , ऐसा बताया जा रहा है कि सबसे पहले यह वायरस चीन में फैला । कैसे फैला , किससे फैला , यह अभी तक कुछ भी नहीं पता । "
" और अपने देश में  इसे लेकर कौन लोग आए ? " ---उसने बड़े ही उदास स्वर में पूछा ।
मैंने मुस्कुराते हुए कहा --- " जो लोग विदेशों से अपने देश में आए ......। "
" नहीं..... नीतू कह रही थी कि मुसलमान लोग ले कर आए हैं और वही लोग यहाँ चारो तरफ फैला भी रहे हैं ...... "
" ऐसा नहीं है बेटा ! कुछ तो सरकार की कमियों के कारण और कुछ धर्मांध लोगों की गलतियों के कारण यह हमारे देश में तेजी से फैला है । "
" वही तो ....। मैंने एकबार आपको मम्मा से बात करते सुना था , सो नीतू से उलझ गई । पर वह मानती ही नहीं है । कहने लगी कि अब हमें  स्कूल में सलमा के साथ नहीं रहना है । "
" कौन सलमा ....?"
" अरे , वही सलमा ....मेरी सहेली , जो मेरे बर्थडे की पार्टी में आई थी । आप कितने भुलक्कड़ हो दादाजी ! वो आपसे मिली तो थी । "
" अरे हाँ , वो शीराज़ की भतीजी ...बहुत अच्छी बच्ची है .....शीराज़ भी बहुत अच्छा लड़का है । बैंक में काम करता है न ? "
" हाँ , तो इसी बात पर मेरा नीतू के साथ आज झगड़ा हो गया.....अरे , वो ऐसा कैसे कह सकती है कि
कोरोनावायरस सारे मुसलमान फैला रहे हैं । "
" नहीं , उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए था । पर तुम्हें भी उससे झगड़ा नहीं करना चाहिए था । "
" क्यों दादाजी ? आप ही तो कहते हैं कि समाज में नफरत और घृणा नहीं फैलाना चाहिए ....फिर यह क्या है ? "
" ठीक है , पर , गलती नीतू की भी नहीं है । वह तो अभी बच्ची है , नादान है । घर - परिवार में जो सुनती है , वही कहती है । लॉकडाऊन खत्म होने दो , मैं तुम्हारे साथ उसके घर जाऊँगा । "
" क्यों ....उसके घर क्यों ? "
" वायरस की दवा लेकर ....। "मैने मुस्कुराते हुए जवाब दिया ।
" वायरस की दवा ! " , उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे , " पर वह तो अभीतक बनी नहीं है दादाजी ! "
" हाँ बेटा , पर, मैं जिस वायरस की बात कर रहा हूँ , वो कोरोनावायरस नहीं है , उससे भी खतरनाक वायरस है ।"
" अच्छा.....!"
" हाँ , कोरोनावायरस से लड़ने के लिए इंसान को इंसान से अलग रहना पड़ता है न ? "
" हाँ....।"
" किंतु , इस वायरस से लड़ने के लिए इंसान को इंसान से हिल मिलकर रहना पड़ता है । " 
" गजब ....! ठीक उसका उल्टा ! " , उसने हँसते हुए कहा , "फिर भी... इसका कोई  तो नाम होगा न दादाजी  ? "
" हाँ , है न बेटा , इसका नाम है .....कम्युनल वायरस ।"

पता नहीं , वह क्या और कितना समझी । 

पर , हँसते हुए बोली --- " दादाजी ! जा रही हूँ मम्मा से पूछने कि वह इस वायरस को जानती है क्या ? "
        
                                 -------कुमार सत्येन्द्र
********************************************

Comments

Popular posts from this blog

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

पहचान की राजनीति

## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।  यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...