सफर
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किसका सफर कहाँ खत्म हो
कोई नहीं जानता
पर , रास्ते रहेंगे ज्यों का त्यों
और रहेगी मंजिल भी
वही ,
जिसकी तलाश में
शुरु हुआ था यह सफर
मुसाफिर भी होंगे
पर ,
नये युग के
नये बोध के साथ
नई ऊर्जा
नये जोश से भरे हुए
सूरज के उगने
और डूबने सा ही
निरंतर है जीवन
रिले रेस की तरह
सौंप जायेंगे हम
अपना बैटन
अगली पीढ़ी को
तुम्हारे चेहरे का विजयी भाव
चिरकालीन नहीं होगा
भ्रम है तुम्हें
कि तुम जीत चुके हो,
जबकि रेस अभी जारी है.
हारे नहीं हैं हम
और नहीं हारेंगे कभी
क्योंकि ,
हमारी बुनियाद में
प्यार है , मोहब्बत है , भाईचारा है
जो बदल देंगे
हार को भी जीत में .
---- कुमार सत्येन्द्र
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