Skip to main content

कोरोना - 2

कोरोना- 2
*************
जब से तुम आए हो , सुना कुछ बदला है
गंगा का पानी अब दिखता कम गंदला है
वायु  प्रदूषण  में भी भारी कमी आई  है
विहँस रहे फूल और कलियां मुस्काई हैं
नीला आकाश भला किसे न सुहाता है
हरी भरी धरती किसे न रास आता है
पर,
 ऐसे परिवर्तन का भला क्याअर्थ है
मानुष बिना तो ये धरती ही व्यर्थ है
शिक्षा के मंदिर में छाया सन्नाटा है
बागों बागीचों में कहाँ कोई जाता है 

तभी , 
झूठी अफवाहों की ऐसी बयार चली
फिरकापरस्तों ने शतरंजी चाल चली
मजहब के नाम पर नफरत है फैलाया
भाई को भाई  से  उन्होंने  लड़वाया

सुरक्षा उपकरणों का घोर था अभाव 
रोज रोज बढ़ता गया  तेरा  प्रभाव 
डॉक्टरों - नर्सों को योद्धा की उपाधि दी
खाली हाथ लड़ते हुए उनने समाधि ली
तुम्हें रोक सकने में सत्ता थी असहाय
लॉकडाऊन सामने था  एकमात्र उपाय
कमियों से , खामियों से नजरें हटाने को
 सब कुछ दुरुस्त कह हमको भरमाने को
कभी ताली - थाली और शंख बजवाए
कभी गुल  बिजली  कर दीपक  जलवाए

उधर महानगरों में मचा हाहाकार था
 औरों का सम्बल,अब खुद ही लाचार था
सारे उद्योगों पर पड़ गए ताले थे
सबको ही  रोटी के पड़ गए लाले थे
लाखों अचानक मजदूर हुए बेकार 
बेसहारा , दीन-हीन, हुए बेघरबार
शहर का चकाचौंध अब लगा डँसने 
नियति लगी  उनकी बेबसी पर हँसने 

माता की गोद जब लगी याद आने 
उजड़े हुए गाँव ही लगे तब सुहाने
मालिकों ने मार दिया पेट पर ही लात
जलने लगीं अंतड़ी , न रोटी , न भात 
दो पहिया , चौपहिया , ट्रेनें भी बंद
सड़कों पर चलने पर  लगा प्रतिबंध
कहाँ रहें , कैसे रहें , जीने की मजबूरी 
घर होता  घर , भला उसकी भी क्या दूरी 

 आँखों के सामने दिखता था गाँव
माटी में खेले जहाँ  ममता की छाँव 
सारी गृहस्थी को सर पर उठाए
अपने मासूमों को सीने से लगाए
चल पड़े पैदल ही माटी के लाल
भूख से भयानक न होता कोई काल
आँधी - तूफान का भी न कोई डर था
पथरीली  राहें , मंजिल उनका घर था
पथरीली राहें , मंजिल उनका घर था .
           ----- कुमार सत्येन्द्र

Comments

Popular posts from this blog

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

पहचान की राजनीति

## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।  यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूँजीपति के मुनाफ़े का सफ़र. अंतिम भाग  हमने ये तो स्थापित कर लिया कि पूँजीपति अपना मुनाफ़ा ना तो कच्चे माल और ना ही उत्पादित वस्तुओं के ख़रीद बिक्री में कमाता है। वह मुनाफ़ा कमाता है उत्पादन के दौरान। लेकिन कैसे? इसको समझने से पहले मैं आपको वापस मार्क्स के दास कैपिटल से एक और शब्द को समझाता हूँ। वह शब्द है “श्रम शक्ति” या “labour power”.  पूँजीपति मज़दूरों से उनके श्रम शक्ति को ख़रीदता है और बदले में उनको मज़दूरी देता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मज़दूरी = श्रम शक्ति।  आपने कभी ये सोचा है कि किस प्रक्रिया से मज़दूरों की न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इसे तय करने वाली कमिटी एक लम्बे प्रक्रिया के बाद यह कैल्क्युलेट करती है कि मज़दूर को महज़ अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कितना मज़दूरी दी जाए। ये कोई नई बात नहीं है। इतिहास में भी सर्फ़ और ग़ुलामों को उत्पाद का उतना ही हिस्सा दिया जाता था जिस से वो महज़ ज़िंदा रहें। उनका हिस्सा परम्परागत तरीक़े से तय किया जाता था जब कि आज के आधुनिक युग में मजदूरों की मज़दूरी श्रम के डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। हालाँकि मज़दूर एक साथ आकर अपनी...