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कोरोना - 2

कोरोना- 2
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जब से तुम आए हो , सुना कुछ बदला है
गंगा का पानी अब दिखता कम गंदला है
वायु  प्रदूषण  में भी भारी कमी आई  है
विहँस रहे फूल और कलियां मुस्काई हैं
नीला आकाश भला किसे न सुहाता है
हरी भरी धरती किसे न रास आता है
पर,
 ऐसे परिवर्तन का भला क्याअर्थ है
मानुष बिना तो ये धरती ही व्यर्थ है
शिक्षा के मंदिर में छाया सन्नाटा है
बागों बागीचों में कहाँ कोई जाता है 

तभी , 
झूठी अफवाहों की ऐसी बयार चली
फिरकापरस्तों ने शतरंजी चाल चली
मजहब के नाम पर नफरत है फैलाया
भाई को भाई  से  उन्होंने  लड़वाया

सुरक्षा उपकरणों का घोर था अभाव 
रोज रोज बढ़ता गया  तेरा  प्रभाव 
डॉक्टरों - नर्सों को योद्धा की उपाधि दी
खाली हाथ लड़ते हुए उनने समाधि ली
तुम्हें रोक सकने में सत्ता थी असहाय
लॉकडाऊन सामने था  एकमात्र उपाय
कमियों से , खामियों से नजरें हटाने को
 सब कुछ दुरुस्त कह हमको भरमाने को
कभी ताली - थाली और शंख बजवाए
कभी गुल  बिजली  कर दीपक  जलवाए

उधर महानगरों में मचा हाहाकार था
 औरों का सम्बल,अब खुद ही लाचार था
सारे उद्योगों पर पड़ गए ताले थे
सबको ही  रोटी के पड़ गए लाले थे
लाखों अचानक मजदूर हुए बेकार 
बेसहारा , दीन-हीन, हुए बेघरबार
शहर का चकाचौंध अब लगा डँसने 
नियति लगी  उनकी बेबसी पर हँसने 

माता की गोद जब लगी याद आने 
उजड़े हुए गाँव ही लगे तब सुहाने
मालिकों ने मार दिया पेट पर ही लात
जलने लगीं अंतड़ी , न रोटी , न भात 
दो पहिया , चौपहिया , ट्रेनें भी बंद
सड़कों पर चलने पर  लगा प्रतिबंध
कहाँ रहें , कैसे रहें , जीने की मजबूरी 
घर होता  घर , भला उसकी भी क्या दूरी 

 आँखों के सामने दिखता था गाँव
माटी में खेले जहाँ  ममता की छाँव 
सारी गृहस्थी को सर पर उठाए
अपने मासूमों को सीने से लगाए
चल पड़े पैदल ही माटी के लाल
भूख से भयानक न होता कोई काल
आँधी - तूफान का भी न कोई डर था
पथरीली  राहें , मंजिल उनका घर था
पथरीली राहें , मंजिल उनका घर था .
           ----- कुमार सत्येन्द्र

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