माँ
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मैं अलग खुद को
कभी समझा नहीं
अस्थिपंजर , खून , मज्जा
बदन का ये कतरा कतरा
रोम रोम सब है तुम्हारा
ऐ मेरे जीवन के सर्जक !
एक दिवस क्या
हर दिवस हूँ याद करता,
वही दुनिया
सौंप जिसको तुम गई थी
रात दिन हूँ मैं उसे आबाद करता
न किसी की माँ को हूँ अपशब्द कहता
न किसी की माँ का हूँ मैं दिल दुखाता
सब की माँ में अक्स तेरा देखता हूँ
इसलिए सबको ही माँ मैं पूजता हूँ
(दुनिया की सारी माताओं को समर्पित)
--- कुमार सत्येन्द्र
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