Skip to main content

भूमि सुधार.....

भूमि सुधार एवं शिक्षा - स्वास्थ्य की मुफ्त व्यवस्था 
**************************************
प्रधानमंत्री जी ने आत्मनिर्भरता के लिए सुधार के जिन चार बिंदुओं की बात की हैं , उनमें पहला बिंदु है -- लैंड यानि भूमि । हमारी प्रमुखताओं में भी हमेशा से भूमि ही प्रथम स्थान पर रहा है । वे भूमि अधिग्रहण को भूमि सुधार(Land reform) मानते हैं और हम भूमि वितरण को । 
आज जब कोरोना के कारण मजदूरों का पलायन शहर से गाँव की ओर हो रहा है , ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निश्चित रूप से बड़ा हलचल होनेवाला है । मजदूरों की अधिकता के कारण , चूंकि ज्यादातर मजदूर भूमिहीन या बहुत ही छोटे जोतदार हैं , उन्हें कम मूल्य में ही अपना श्रम गाँवों में बेचने को मजबूर होना पड़ सकता है । दूसरी ओर किसानों को उनकी फसलों का , स्वामीनाथन रिपोर्ट के अनुसार तो छोड़िए , न्यूनतम समर्थन मूल्य भी मिलने की संभावना नहीं दीखती । ऐसे में एकमात्र मनरेगा ही रोजगार का सहारा बचता है , जिसके लिए बजटीय आवंटन पर्याप्त नहीं है । अतः रोजगार के अवसरों की कमी बनी रहेगी ।
पिछले तीन - चार दशकों में सरकार की उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण  ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सिमट गए हैं , क्योंकि भूमि सुधार के अभाव में बहुसंख्य किसान परिवार या तो भूमिहीन हो गए हैं या उनके पास बहुत मामूली सी जोत रह गई है । ऊपर से फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पा रहा था । अतः जीने के लिए न्यूनतम साधन जुटाने हेतु नौजवानों ने गाँवों से पलायन किया । वे ऋतुओं के अनुसार गाँवों और शहरों में काम करके अपना परिवार चलाने लगे । इसीलिए शहरों में उन्हें सीजनल वर्कर भी कहा जाता है । आज मजदूरों का जो हुजूम शहरों से गाँवों की ओर वापसी कर रहा है , उसमें बड़ी संख्या उन्हीं मजदूरों की है ।
केंद्रीय सरकार पिछले दो - तीन वर्षों से जो सहायता राशि किसानों को दे रही है , वह पर्याप्त भले ही न हो , जिंदा रखने की एक कोशिश जरूर है । साथ ही , ऐसी योजनाओं द्वारा यह भ्रम फैलाने में भी सुविधा होती है कि सरकार किसान हितैषी है । नतीजतन ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार के प्रति उठता असंतोष शमित हो जाता है और सरकार जब कॉरपोरेट कंपनियों के लिए नियमों को ताक पर रखकर भूमि अधिग्रहण करती है , तो किसानों द्वारा व्यापक स्तर पर  कोई संगठित विरोध आयोजित नहीं हो पाता । स्थानीय स्तर पर हो रहे इन विरोधों को या तो सरकार द्वारा गोली - डंडे की जोर से दबा दिया जाता है या फिर आंदोलन को इतना लंबा खिंचा जाता है कि किसान सरकार की शर्तों को मान लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं ।  वैकल्पिक आर्थिक नीतियों से जुड़े किसान संगठनों की सांगठनिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि वे हर जगह सशक्त हस्तक्षेप कर सकें । उन्हें अपनी स्थिति मजबूत करने की जरूरत है ।
आज गाँवों की ओर वापसी करते नौजवानों को यह समझने की खास आवश्यकता है कि गाँवों का विकास उनके लिए कितना जरूरी है और यह भी कि भूमि सुधार कानून के लागू होने से ही गाँवों का विकास संभव है । बिहार जैसे राज्य में तो भूमि सुधार कानून को लागू करना नितांत आवश्यक है । यही समय है , जब किसान संगठनों को बंदोपाध्याय कमिटी के सिफारिशों को लागू करने की मांग उठानी चाहिए और स्वामीनाथन आयोग के अनुशंसा के आधार पर फसलों के मूल्य तय करने की मांग भी । 
साथ ही , कोरोना ने यह अवसर भी हमें प्रदान किया है कि हम इस संकट की जड़ पूंजीवाद के बरक्स समाजवाद की उपलब्धियों को लोगों के समक्ष रख सकें । क्यूबा , वियतनाम , चीन और हमारे देश में छोटा सा राज्य केरल इसलिए इस महामारी को रोक पाने में सफल हुए हैं कि वहाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की मजबूत और बहुस्तरीय व्यवस्था है । पूंजीवाद , जिसका आधार ही मुनाफा है , कभी भी शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सर्वसुलभ और पूर्णतः मुफ्त  व्यवस्था कायम नहीं कर सकता । इसीलिए उसने इन दोनों क्षेत्रों का व्यापक स्तर पर निजीकरण और व्यवसायिकरण करने का काम किया है । सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ और सिर्फ समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है । हमारे संविधान की प्रस्तावना में भी समाजवाद की बात की गई है । हमें अपने संविधान की मूल भावना को समझने और लागू करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए ।

Comments

Popular posts from this blog

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

पहचान की राजनीति

## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।  यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...