जब भी अमृत की धारा फूटती है, जहर अपना सिर ऊपर उठाने लगता है ।अकबर ने चाहा था कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच का भेद कम से कम कर दिया जाए ।शेख सरहिंदी ने आंदोलन चलाया कि इस्लाम की खैरियत इसी में है कि वह हिंदुत्व के स्पर्श से दूर रहे । वर्त्तमान युग में अकबरी नीति की परिणति महात्मा गाँधी में हुई और शेख सरहिंदी के दर्शन का प्रतिनिधित्व जिन्ना साहब ने किया । अमृत और हलाहल के इस संघर्ष में जीत अबतक हलाहल की ही हुई है । जब दाराशिकोह मारा गया , तब जहर की जीत और अमृत की हार हुई थी । जब भारत का विभाजन हुआ , तब भी पराजय अमृत की हुई । लेकिन क्या अकबर , दाराशिकोह और गाँधी आगे भी हारते ही जायेंगे और जीत उन्हीं की होती जाएगी , जो शेख अहमद सरहिंदी ,औरंगजेब और नाथूराम गोडसे के साथ हैं । यही वह सवाल है , जिसका जवाब हिंदुओं और मुसलमानों को साथ होकर ढूँढ़ना है ।
---- रामधारी सिंह दिनकर , "संस्कृति के चार अध्याय " से उधृत ।
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