दामन से कालिख मिटाने चलें हैं
कि वो फिर से इतिहास लिखाने चले हैं
जंग-ए-आजादी से दूर जो रहे थे
दुश्मनों की आँखों के नूर जो रहे थे
कि वो अपना नंबर बनाने चले हैं
हुकुम थे बजाए दरबारी बनकर
कहर थे ढहाए पटवारी बनकर
वतन से मुहब्बत सिखाने चले हैं
नफरत दिलों में जो बो रहे हैं
जिनका विरासत वो ढो रहें हैं
उनका हकीकत छिपाने चलें हैं
शहीदों के ख्वाबों को ख़ाक में मिलाकर
उनके मजारों पर मेले लगाकर
बोली वतन का लगाने चलें हैं
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