जठराग्नि
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पेट की आग ने ही शायद
दिया होगा मानव समाज को विस्तार
लाया होगा खिंचकर
साइबेरिया के बर्फीले मैदान से
अफ्रीका के जलते रेगिस्तान से
सिंधु के मीठे शीतल आब तक
गंगा - जमुना के बड़े दोआब तक
पसरी होगी सभ्यता ,नदियों के कछार पर
हरे भरे वनों से घिरे ,पथरीले पठार पर
यह पेट की ही आग है
जो हजारों जलती अँतड़ियों को
ले जाती है गाँव से शहर
और कभी शहर से गाँव
बड़वाग्नि - दावाग्नि से भी
होती है भयानक जठराग्नि
नहीं मानती वह , किसी राजाज्ञा को
अनुशासन को , शासन - प्रशासन को
कोरोना काल में जो हुए मजबूर
भटक रहे यहाँ वहाँ लाखों मजदूर
ठाँव - ठौर छिन गया हुए लाचार
तालाबंदी ने छीन ली उनका रोजगार
भीख माँग जीना उन्हें नहीं था मंजूर
लौट जाना चाहे गाँव, जो था अति दूर
तुमने चाहा बाँधना इन्हें इनकी ही मजबूरियों में
बसों को रोककर ,गाड़ियों को रोककर
सड़कों पर लोहे की बैरियरें ठोककर
पर, इनके पाँव हैं पगडंडियों को पहचानते
बीहड़ों में भी हैं राहें बनाना जानते
अग्निपथ के ये पथिक रुकना नहीं जानते
लाख हों मुसीबतें झुकना नहीं जानते
पीठ पर बँधे हैं बस कुछ दिनों के निवाले
पाँव में हैं पड़ चुके जाने कितने ही छाले
किंतु आँखों में छलकता उनका स्वाभिमान है
तुम क्या जानों दोस्त ! यही खुद्दार हिंदुस्तान है .
---- कुमार सत्येन्द्र
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