मैं मनुआ के घर पहुँचा तो वह पांडे से उलझा हुआ था । मुझे देखते हीं बोला -" आइए बाबूजी ' ई सुनिए..पांडे भइया का कह रहे हैं ....। "
" हँ ..तो कौनो झूठो कह रहे हैं ... का सर ! ई राष्ट्रपति चुनाव में मनुआ के दूनों हाथ में लड्डू नहीं है ...कउनो जीते , जीतेगा तो दलिते न ! "
" हँ ...तो उससे हमको का मिल जाएगा ....हमरी नौकरी परमामेंट हो जाएगी ...कि हमरी दिहाड़ी बढ़ जाएगी ...कि हमरा बच्चा सब जौना स्कूल में पढ़ते हैं , ओह में सुधार हो जाएगा ...कि हमरा बाबू जे खेतिया में हाड़ तोड़ कमाते हैं और साग - सब्जी ऊपजाते हैं , ओकर सही दाम मिल जाएगा ....? "
" दूर बुड़बक , एके गीतिया सगर रतिया ....अरे इज्जत - परतिष्ठा भी कौनो चीज है कि नहीं ! ...तुम्हरी जाति का आदमी इतना ऊँचा आसन पर बैठेगा , ई तुम्हरे लिए फखर की बात नहीं है का ? "
" का कहे ! ऊँचा आसन ! ई तो ऊहे कहावत वाली बात है न ...ऊँच बंड़ेरी खोंखड़ बाँस ....अरे बनाना हीं था तो परधानमंत्री बनाते , जेकर पॉवर है कि एगो अदना के भी अडाणी बना दे ....चाहे तो लीख के लाख और लाख के लीख कर दे ....ई आसन तो भीषम पितामह के सिंहासन है भइया , खूँटा से बँधे रहिए और दुर्योधन के सारे करम - कुकरम पर मोहर लगाते रहिए । "
" भकचोन्हर ! तुम्हरी छोट बुद्धि में एतना बड़ बात कबहूँ न घुसेगा । "
" नहीं भइया , आपको नहीं मालूम कि हम्मर बुद्धि अब छोट नहीं रहा ....ई जात - धरम का जो खेल खेल के आजतक बाबू लोग हमरा हक मारते रहे , ऊ के हमलोग समझ गए हैं ....आप अभियो अन्हारा में हैं । हमरी जाति से कतने मंत्री - मुख्यमंत्री हुए , पर हमरी हालत में का सुधार हुआ ? उल्टे स्थिति और भी बदतर हुई ....ऊना से लेकर सहारनपुर तक न केवल लात - जूता खाए , बल्कि खून भी बहा और घर - दुआर भी जलाया गया ....तब ई हम्मर जात के मंत्री उदित राज , रामविलास पासवान और ई राज्यपाल रहिन , रामनाथ कोविंद जी या मीरा कुमार कहँवा सो रहे थे ...भइया ! जात - धरम के घंटी बान्हे से आपको फायदा है तो आप बान्ह के बजाइए , हम तो खट के खाए वाला की जाति में शामिल हो गए हैं और समाज के जोंकवन को पहचान लिये हैं .....। "
" अरे बस कर ...बस कर ...बहुत लमहर भाषण दे दिया , बाकि हम जानते हैं कि तुम्हरे मन में लड्डू जरूर फूट रहा होगा ...काहे कि तुम्हरा दूनो हाथ में लड्डू जो है । अच्छा सर जी ! चलते हैं , फिर मिलेंगे । " -- कहते हुए पांडे चला गया । मनुआ मेरी ओर देखकर मुस्कुराया और बोला - " ई नहीं सुधरेंगे बाबूजी ! "
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