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सिर्फ नेता नहीं , नीतियां बदलो

सिर्फ नेता नहीं , नीतियां बदलो 
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अँग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए चल रहे  मुक्ति संग्राम की मुख्यतः तीन धाराएं थीं । एक धारा (मुख्य धारा) का नेतृत्व गाँधी-नेहरू-पटेल आदि कर रहे थे । दूसरी धारा का एक ओर मो. जिन्ना और दूसरी ओर सावरकर आदि कर रहे थे । तीसरी धारा (क्षीण धारा) का नेतृत्व शहीदेआजम , उनके साथी और वामपंथी विचार के लोग कर रहे थे । प्रथम धारा (मुख्य धारा) ने आजादी के बाद कई उतार-चढ़ाव के बावजूद कई वर्षों तक शासन किया । उसने अपनी महती जिम्मेदारी निभाई और अपने सिद्धांतों के अनुरूप सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था कायम की । बाद में , उसकी अपनी नीतियों में विचलन के कारण जनता में जबर्दस्त असंतोष पैदा हुआ , जिसका लाभ दूसरी धारा के हिंदूत्ववादी संस्करण , जिसने अपनी जड़ें काफी मजबूत कर ली थीं , को मिला और वह धारा सत्तारूढ़ हुई । अपनी विभाजनकारी नीतियों तथा पूंजीवाद पर आए वैश्विक संकट के कारण वह हर मोर्चे पर विफल हो रही है । उसने उक्त संकट का पूरा बोझ किसानों - मजदूरों - कर्मचारियों और जनता के उन तबकों पर डाल दिया है , जो बुरी तरह शोषित - पीड़ित हैं । कोढ़ में खाज यह कि ठीक उसी समय "कोरोना" नामक वैश्विक महामारी फैल गई है । पूंजीवादी नीतियों के लागू होने के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की पूरी ढाँचा चरमराई हुई है और निजी क्षेत्र की सेवाएँ इतनी महँगी हैं कि आबादी के दो - चार प्रतिशत लोग ही उसका लाभ उठा पायेंगे । शेष आबादी उसी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर निर्भर है । पहले से आर्थिक मंदी की मार झेल रही व्यवस्था में बेरोजगारी अपनी चरम पर थी ही , इस महामारी के कारण उसने विकराल रूप धारण कर लिया है , जिससे निपटने में वर्त्तमान व्यवस्था बिलकुल ही लाचार है । वह अपनी पुरानी विभाजनकारी नीतियों का ही इस्तेमाल इस संकट से उबरने के लिए करेगी । 
                 ऐसे में किसानों - मजदूरों और गरीब जनता के व्यापक हिस्से की नजर अब तीसरी धारा के विरासत ढोनेवालों पर टिकी है । इनके लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर भी है और जिम्मेदारी भी । टुकड़ों में बिखरी तमाम वाम - जनवादी शक्तियों की एकता वक्त की माँग है । आज जनता के विशाल हिस्से को , जो हर सुविधा से महरूम है , सामाजिक उत्पीड़न और दमन का भयंकर रूप से शिकार है , एकताबद्ध कर व्यापक जनांदोलन का निर्माण करने की आवश्यकता है । तभी हम एक ऐसी व्यवस्था कायम करने में सफल होंगे , जो मजदूरों - किसानों और तमाम शोषित  - पीड़ित जनता की सुरक्षा और उत्थान की गारंटी करेगी 
           चूंकि आज सत्ता का हस्तांतरण लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव के माध्यम से होता है , सभी मेहनतकशों की व्यापक एकता कायम करके ही शोषित वर्ग सत्ता पर काबिज हो सकता है । जरूरत सिर्फ नेता बदलने की नहीं , नीतियां बदलने की भी है ।

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