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अब न सुनबौ मन के बात

अब न सुनबौ मन के बात(मगही कविता)
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चीकन चीकन बात सुनयलें
हमनी के  ऊ  मे   भरमयलें
मोटा  अपने  माल  बनयलें
कर हमनी से भीतर घात 
अब न सुनबौ.................
पनरह लाख न अब तक देलें
जुमला - जुमला कह के हँसलें
तौना  पर  नोटबंदी   करके
मरलें  सबके  पेट प  लात
अब न सुनबौ...................
 टुपुर - टुपुर  लोर  चुआके
रो के,गा के,गाल  बजा के
ऊँचा - ऊँचा मंच सजा के
भूखमरी  देलें  सौगात
अब न सुनबौ.............
गैयन के रच्छा  करवयलें
फिर सब के छुट्टा छोड़ देलें
ऊ हे गैयन आके चर गेल
हम्मर खेतवा रात - विरात
अब न सुनबौ...............
फिर   मुआ   कोरोना   अयलक
लॉक  डाउन  सगरे  करवयलक
बड़का बड़का लंगा हो गेल
हमनी के हल कउन बिसात
अब न सुनबौ .................
ताली - थाली - शंख बजइली
कड़की में भी  दीप  जरइली
ऊ   ससुरा   तबहूँ  न  गेलक
जाने केकरा करत अघात
अब न सुनबौ मन के बात ।
       ----- कुमार सत्येन्द्र


















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