Skip to main content

शिक्षा और स्वास्थ्य

ये सारी समस्याएँ , शिक्षा - स्वास्थ्य से लेकर रोजी - रोटी - रोजगार तक इस व्यवस्था की देन है , जिसे बदलने की बात करने वाले लोग देशद्रोही कहलाते हैं । आठ के दशक तक बिलकुल ऐसी स्थिति नहीं थी । फिर आई नवीं दशक में उदारवादी आर्थिक एवं औद्योगिक नीतियाँ , जिसकी बुनियाद में ही निजीकरण और बाजारवाद - उपभोक्तावाद है । इस परिवर्तन के कारण आइ टी सहित कई क्षेत्रों में बेतहाशा रोजगार के सृजन हुए । सेवा के क्षेत्र में , मसलन शिक्षा , स्वास्थ्य और परिवहन में , भी काफी रोजगार सृजित हुए । देश के जीडीपी ने छलांग लगाना शुरू किया और शुरू के दो दशकों में एक खाता - पीता बहुत बड़ा मध्यवर्ग तैयार हुआ , जिसे इन नीतियों का कुछ लाभ मिल रहा था । उसने हर हाल में इन नीतियों का समर्थन किया । बेइंतहा मुनाफा कमाना पूंजी की फितरत होती है । पूंजी का संकेंद्रण और एकत्रीकरण चंद हाथों में होता रहा । वेलफेयर स्टेट की अवधारणा को ठेंगा दिखा दिया गया और सरकारी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों को सफेद हाथी घोषित करते हुए उन्हें निकम्मेपन   और भ्रष्टाचार का अड्डा बताया जाने लगा । इन क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों - मजदूरों ने स्वयं भी अपने राजनीतिक आकाओं के दुष्प्रचार से प्रभावित होकर इसे स्वीकार कर लिया । इनके विरोध का स्वर मंद पड़ गया । उधर मंदिर - मस्जिद के झगड़े से उत्पन्न शोर में इन नीतियों के समर्थक दलों की सरकारों ने खामोशी से इन नीतियों को आगे बढ़ाया । पूंजी के बढ़ते पंजे की जद में देश का सारा संसाधन सिमट गया । बड़े बड़े कॉरपोरेट कंपनियों ने देश के आर्थिक - औद्योगिक क्षेत्र पर पूरा कब्जा कर लिया । उनके इस पुनीत कार्य को अंजाम देने में देश के दोनों बड़े राजनीतिक दलों ने भरपूर सहयोग किया । पूंजी ने भारतीय लोकतंत्र को पूर्णतः हाईजैक कर लिया और चुनाव में अपने गुर्गों को खड़ा कर जिताना शुरू कर दिया । अब कॉरपोरेट कंपनियाँ ही सरकार की नीतियों का नियामक बन गईं । हमारी मिश्रित अर्थव्यवस्था और लोक कल्याण की अवधारणा इन दानवीय कंपनियों की भेंट चढ़ गए । 
इस बीच मध्यवर्ग के नवधनाढ्यों (?)  के  बेरोजगारी से त्रस्त  शिक्षित लड़कों ने कोचिंग , छोटे - बड़े स्कूल और नर्सिंग होम खोलकर अपनी आजीविका शुरू कर दिया । कॉरपोरेट कंपनियों की देखादेखी इन्होंने भी मुनाफे के लिए उन्हीं हथकंडों को अपनाया , जिसका जिक्र ऊपर के पोस्ट में है । इनसे निजात पाने  का बस एक ही उपाय है कि शिक्षा और स्वास्थ्य को सरकार अपने हाथ में ले और देश के लोगों को एक शिक्षा - मुफ्त शिक्षा और एक स्वास्थ्य प्रणाली - मुफ्त ईलाज की सुविधा प्रदान करे ।

Comments

Popular posts from this blog

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

पहचान की राजनीति

## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।  यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूँजीपति के मुनाफ़े का सफ़र. अंतिम भाग  हमने ये तो स्थापित कर लिया कि पूँजीपति अपना मुनाफ़ा ना तो कच्चे माल और ना ही उत्पादित वस्तुओं के ख़रीद बिक्री में कमाता है। वह मुनाफ़ा कमाता है उत्पादन के दौरान। लेकिन कैसे? इसको समझने से पहले मैं आपको वापस मार्क्स के दास कैपिटल से एक और शब्द को समझाता हूँ। वह शब्द है “श्रम शक्ति” या “labour power”.  पूँजीपति मज़दूरों से उनके श्रम शक्ति को ख़रीदता है और बदले में उनको मज़दूरी देता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मज़दूरी = श्रम शक्ति।  आपने कभी ये सोचा है कि किस प्रक्रिया से मज़दूरों की न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इसे तय करने वाली कमिटी एक लम्बे प्रक्रिया के बाद यह कैल्क्युलेट करती है कि मज़दूर को महज़ अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कितना मज़दूरी दी जाए। ये कोई नई बात नहीं है। इतिहास में भी सर्फ़ और ग़ुलामों को उत्पाद का उतना ही हिस्सा दिया जाता था जिस से वो महज़ ज़िंदा रहें। उनका हिस्सा परम्परागत तरीक़े से तय किया जाता था जब कि आज के आधुनिक युग में मजदूरों की मज़दूरी श्रम के डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। हालाँकि मज़दूर एक साथ आकर अपनी...