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मुठभेड़

मुठभेड़ ( लघुकथा)
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वे लोग उसे बुरी तरह पीट रहे थे । पीटने वाले खाकी वर्दी में थे और पिटने वाले के कपड़े की शिनाख्त करना मुश्किल था कि  पिटने से पहले उसने क्या पहन रखे थे । बहरहाल वह लगभग नंगा था । कमर से मात्र एक जांघिया लिपटी थी । उसका बदन लहूलुहान हो रहा था । 
            थाने के कैंपस में मैंने पैर ही रखे  थे कि उनके हाथों को मानो ब्रेक लग गये । किंतु , उनकी जुबान अब भी चल रही थी -- " मादर....सुअर के जने ...सुधर जा बे स्सा..., वरना हम तुम्हें.....।" 
मैं कवाब में हड्डी की तरह अचानक उपस्थित हो गया था । थानेदार ने पहले तो मुझे हिकारत भरी निगाह से देखा । फिर संयत होते हुए पूछा ---" कहिए मास्साब ! कैसे आना हुआ ? "
चूंकि उस छोटे से कस्बे में थाना और प्रखंड कार्यालय के अलावा जो तीसरा महत्वपूर्ण सरकारी महकमा था , वह था --महात्मा गाँधी राजकीय उच्चविद्यालय , जिसका मैं प्राचार्य था । चूंकि थानेदार की तरह ही मेरी भी सरकारी एवं सामाजिक हैसियत थी , इसीलिए शायद मुझे आदर के साथ संबोधित किया गया था । वरना , " का है रे ! " के साथ ही मेरा भी स्वागत होता । थाने के इस दृश्य ने मुझे इतना विचलित कर दिया कि मैं अपने आने का उद्देश्य ही भूल गया । 
" कौन है वह ...?" -- मेरे मुँह से अनायास ही निकला ।
थानेदार ने उसकी ओर घृणा से देखा । दो सिपाही उसे सहारा देकर हाजत की ओर ले जा रहे थे । थानेदार की भारी आवाज फिर से गूंजी -- " ले जाकर ठीक से बंद कर दो स्सा...को , इस कुत्ते ने जीना हराम कर रखा है । ", फिर मेरी ओर मुखातिब हुआ , " हाँ मास्साब ! कहिए , कैसे आना हुआ ? "
मैंने खुद को संयत करते हुए पुनः वही प्रश्न दोहराया --- " कौन है वह....? "
" अरे , साहब ! क्या बतायें कि कौन है ! इस इलाके का आतंक है स्सा...।" , थानेदार ने कुर्सी पर बैठते हुए जवाब दिया ।
" कोई चोर है ...? ", मेरी जिज्ञासा बढ़़ती ही जा रही थी।
" अरे , नहीं साहेब ! चोर - उच्चकों को हम इतना थोड़ी ही पीटते हैं ...।", उसका चेहरा अब तनाव मुक्त था ।
" तो फिर ...कोई दुर्दांत डकैत ...या लूटेरा ? "
" वह होता तो यहाँ होता साहब , कि किसी विधान सभा या संसद में एयरकंडीशन की हवा खा रहा होता...। " , कहकर उसने हो..हो...कर हँस दिया ।
"तो फिर ....दंगाई होगा ? "
" क्या कहते हैं मास्साब ! अरे, उन्हें तो हम हाथ तक नहीं लगाते । पता नहीं , किस राजनेता का साला - बहनोई या कोई सगा निकल जाये ।", कहकर वह फिर हँसा ।
तभी मेरा ध्यान अखबारों की सूर्खियों की ओर गया । आये दिन ब्राऊन शुगर की तस्करी को लेकर खबरें छपती रहती थीं ।
" तो , जरूर किसी नशीले पदार्थ का तस्कर होगा । "
" आप भी न सर , बहुत भोले हैं ।उन्हें पकड़ना इतना आसान है क्या ? तस्करों का गिरोह राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय होता है और उन्हें कई देशों की सरकारों का संरक्षण भी प्राप्त होता है । "
थानेदार ने मुझे अल्पज्ञ घोषित करते हुए मानो मेरे सामान्य ज्ञान में वृद्धि की । अब मेरे सब्र का बाँध टूट चुका था । मैंने खीझते हुए पूछा , " तो फिर उसने ऐसा कौन सा संगीन जुर्म किया है कि .......?"
बीच में ही हस्तक्षेप करते हुए थानेदार ने कहा --- " उसका जुर्म सिर्फ संगीन ही नहीं है , मास्साब ! अक्षम्य भी है । यह ससुरा दिन - रात दलितों की बस्तियों में घूम - घूम कर उन्हें उल्टा - पुल्टा समझाते रहता है । कभी ज्यादा मजदूरी के लिए उकसाता है , तो कभी सर उठाकर  चलने के लिए । अब आप ही बताइए कि ये चूड़े ..... भी हमारे सामने सिर उठाकर चलने लगेंगे , हमारे साथ खटिया - चौकी पर बैठने लगेंगे ,  हर बात में हमारी बराबरी करने लगेंगे , तो सदियों पुरानी हमारी हिंदू संस्कृति का क्या होगा ?  बोलिए , इसका जुर्म अक्षम्य है कि नहीं ? "
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा बैठा रहा । आने का मकसद तो पहले ही विस्मृत हो चुका था , अब वहाँ रूकना ही असह्य होने लगा । मैं चुपचाप उठकर चल दिया । तभी मेरी नजर थाने के अहाते में खड़ी गाँधी की मूर्ति पर पड़ी । मुझे लगा कि मूर्ति बीच से दरक गई है । मैंने मन ही मन बापू से प्रश्न किया ---" क्या ऐसी ही आजादी का सपना तुमने देखा था , बापू ? "
अगली सुबह अखबार की सूर्खियों के बीच मोटे - मोटे अक्षरों में एक खबर प्रमुखता से छपी थी --- " जिले का कुख्यात उग्रवादी कल रात पुलिस मुठभेड़ में मारा गया......!!"

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