संदर्भ बदलेगा
बदलते संबंधों के मकड़जाल में
खो गया है सबकुछ
शेष है तो बस
कुछ धुँधली धुँधली यादें
और
साँसों की टूटती शृंखलाएँ
बादलों की ओट से
उझकता चाँद
एक नई आशा
एक नया अहसास
ओस की चंद बूंदें
और
होठों की अंतहीन प्यास
अनसुलझे सवालों से घिरा आदमी
अर्थ खोते शब्दों से रचता
आनेवाले समय की ऋचाएं
कि होगा एक और समुद्र-मंथन
लेंगी आकार तब
ये आड़ी-तिरछी रेखाएं
टूटेंगे मकड़जाल
बदलेंगे शब्दों के अर्थ
वहीं से होगी
नए संबंधों की शुरुआत
तब एकबार फिर
बदलेगा संदर्भ
आदमी की सोच के केंद्र में
होगा आदमी
जी हाँ , आदमी ।
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