चूहे
द्रुतगति से
तलघर से ऊपर तल्ले तक
उछलते-कूदते
ऊधम मचाते
हर वस्तु को खंडित करते
ये लिजलिजे चूहे
नहीं जानते करना सृजन
इन्हें तो बस करना है
हमेंशा ही
भक्षण,भंजन या विध्वंस
कहाँ नहीं हैं ये ?
जंगलों - पहाड़ों में
गहरी खदानों में
खेतों - खलिहानों में
कल - कारखानों में
बड़े - बड़े संस्थानों में
बुनियादों को
तार - तार करते
सभ्यता - संस्कृति को
ज्ञान - विज्ञान को
कुतरते अपने पैने दाँतों से
सदियों से रहे हैं ये
और सदियों तक रहेंगे भी
इनसे मुक्ति आसान नहीं
हाँ , कर सकते हैं नियंत्रण
किंतु , सावधान !
मत डालना कभी हाथ
इनके अँधेरे बिलों में
क्योकि ,
करते हैं उन्हीं में वास
बड़े - बड़े विषधर भी
इनसे मुक्ति के लिए
ढाहना होगा
इनके बिलों को
डालना होगा उनमें
पानी की तेज धार
और घेरना होगा उन्हें
बाहर खुले में
करना होगा प्रहार
लगातार - लगातार ।
---- कुमार सत्येंद्र
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