करिया आखर (भोजपुरी)
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केकरो कहल न रऊवा सूनीं
करिया आखर के बस गूनी
कल का भईल जे जानल चाहीं
आज के सुनर बनावल चाहीं
कल के राह देखावल चाहीं
तख्ती ले के क - ख लीखीं
जोड़-गुणा बनावल सीखीं
देख कितबिया जन सिर धूनीं
करिया आखर ..................
पढ़ब , लिखब तब न बूझब
काहे सुरूजवा पुरबे ऊगे
दक्खिने चल के पच्छिमें डूबे
चान न काहे हमरा जारे
टिकल बा धरती केकर सहारे
बिखरल मोती अब त चूनीं
करिया आखर .................
खाली पेट आ पीठ उघार
सब दिन जीअनीं हाथ पसार
ना बुझलीं आपन अधिकार
अब त बूझीं अब त चेतीं
अन्हरिया के गर्दन रेतीं
सुनर सपना अब त बुनीं
करिया आखर के बस गुनीं
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