गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु को याद करने की परंपरा
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पता नहीं , यह चलन कब , कहाँ, क्यों और कैसे शुरू हुआ कि साल के 365 दिनों को अलग - अलग रिश्तों के लिए अलॉट कर दिया गया । उस दिन उस रिश्ते को निभा लीजिए , आदर - स्नेह बाँट लीजिए फिर साल भर इच्छा हो , तो याद कीजिए या नहीं ।
कहा जाता है कि आज के जीवन की गति पहले सी मंथर नहीं है , झंझावाती हवा सी तेज है । जो धीमा चला , पीछे छूट जाएगा । और सचमुच , इस आपाधापी में लोग पीछे छूटे जा रहे हैं ।
रिश्तों के बंधन या तो ढीले पड़ रहे हैं या समय एवं परिस्थितियों के थपेड़े खा-खा कर दरक रहे हैं , टूट रहे हैं । अस्वस्थ , अपाहिज , बीमार और बूढ़े इस दौड़ में पीछे छूट जाने को अभिशप्त हैं । अधिकांश परिवारों में उनके और समाज के लिए अनुपयोगी बने ये लोग एक बोझ सा बन गए हैं । आज तेजी से हो रही तकनीकी विकास ने ऐसे - ऐसे यंत्र ईजाद कर दिये हैं , जो परिवार में बुजुर्गों के रिप्लेसमेंट का सबब बन गये हैं । जी हाँ , दादा - दादी और नाना - नानी की कहानियों का स्थान उन उपकरणों ने ले लिया है , जो श्रव्य ही नहीं , दृश्य भी हैं । गुरुओं का स्थान भी इलेक्ट्रोनिक गडगेट्स ने ले लिया है । इनकी संप्रेषणीयता भी अधिक है और इनके रख रखाव पर खर्च भी कम है ।ऐसे में यंत्रों की ही तरह मानवीय संबंधों का भी मेंटेनेंस और नवीनीकरण किया जाने लगा है । इसीलिए फादर्स डे , मदर्स डे , टीचर्स डे , अर्थ डे , पर्यावरण डे , फ्रेंड्सशीप डे , वेलेंटाइन डे आदि मनाया जाने लगा है । एक दिन याद कर लो , चरण - वंदन कर लो , गलबाहियाँ लग - लगा लो और साल भर उसकी याद को दिल में संजोए रखो , बाकी कसर बाजार ने पूरी कर दी । पहले उससे संबंधित कार्ड आदि बनाकर और अब एस एम एस , ह्वाट्सएप आदि इंटरनेट के माध्यम से त्वरित गति से सुदूर भेजे जा सकने वाले मैसेज बनाकर ।
उन्हीं पवित्र दिवसों में से एक है -- गुरु पूर्णिमा । पूर्णिमा को पता नहीं , कब और कैसे गुरु से जोड़कर धुआँधार प्रचारित किया गया और आज का दिन गुरु या गुरुओं को याद करने का दिन बन गया । अब ऐसा कौन शख्स है , जो कह दे कि मेरा कोई गुरु ही नहींं रहा है ! अतः मैं प्रथम गुरु माँ सहित अपने सभी गुरुओं को प्रणाम करता हूँ ।
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