परसों रक्षाबंधन था । अपने बाल्यकाल में मैं इस शब्द से सर्वथा अनभिज्ञ था । बचपन में पढ़ाई तथा खेल के अलावा मैं रंगकर्म के प्रति काफी रुचि रखता था । रामलीला और नौटंकी देखना मुझे बहुत पसंद था । पिताजी तथा घर के अन्य बड़ों के विरोध के बावजूद छुप - छुपा कर इन्हें देखने चला ही जाता था । फिर घर आकर उसका नकल उतारता था ।
उनदिनों नाटक की पतली पतली किताबें जो हमें मिलती थीं , वे थीं -- सुल्ताना डाकू , दमाद वध , अरावली का शेर , हल्दीघाटी का शेर , आहूति , दानी कर्ण , चंद्रगुप्त आदि । जहाँ तक मुझे याद है , इनके लेखक थे -- चतुर्भुज । ' आहूति ' (शायद यही नाम था) नाटक , जिसमें रानी कर्मावती और हुमायूँ के जीवन की कुछ झलकियां थीं , खेलते समय पहली बार मैंने राखी या रक्षाबंधन सुना था । उस नाटक में मैं भी एक पात्र की भूमिका निभा रहा था । आपको हँसी आएगी , यह जानकर कि उस समय हमारे गाँवों में मंचित नाटकों में औरत की भूमिका भी मर्द / लड़का ही निभाया करता था , क्योंकि बहुत ही कम लड़कियाँ या औरतें शिक्षित होती थीं । और , जब पढ़ाई पर ही इतनी रोक थी , तो मंच पर अभिनय करना तो बहुत दूर की बात थी । चूंकि मेरी उम्र कम थी और अभी चेहरे पर मूँछें नहीं उगी थीं , मुझे कर्मावती की भूमिका निभानी पड़ी थी ।
चित्तौड़गढ़ की सत्ताशीन रानी कर्मावती विधवा थी । उसके राज्य पर पड़ोसी राज्य गुजरात का राजा बहादुर शाह हमला कर देता है । रानी कर्मावती हुमायूँ से मदद चाहती है । वह हुमायूँ के पास राखी भेजकर आग्रह करती है कि इस बहन की रक्षा करे । यहाँ हुमायूँ ने इतिहास में एक अद्वितीय नजीर पेश किया है और इससे यह भी पता चलता है कि उन दिनों राजाओं के बीच मित्रता और शत्रुता का आधार धर्म नहीं होता था । एक हिंंदू बहन की लाज की रक्षा करने हेतु एक मुसलमान भाई युद्ध के मोर्चे को छोड़कर भागा चला आता है । तब वह किसी और मोर्चे पर युद्धरत था । किंतु , उसको पहुँचने में थोड़ी देर हो जाती है और वीरांगना कर्मावती अपना जौहर कर चुकी होती है । वह महल की तमाम स्त्रियों के साथ जलते कुंड में कूदकर अपने प्राण की आहूति दे देती है । अद्भुत घटना थी यह । देर से पहुँचा हुमायूँ बहन द्वारा भेजी गई राखी की लाज नहीं निभा पाने से दुखी होता है और उसका बदला गुजरात के उस बादशाह को युद्ध में हराकर लेता है तथा चित्तौड़गढ़ रानी कर्मावती के बेटे को सौंप देता है ।
जब मैं कॉलेज में पढ़ने पहुँचा, तब रंगमंच से लगाव के कारण फिल्मों की ओर आकर्षित हुआ । कई फिल्मों में मैंने रक्षाबंधन के दृश्य देखे । तब भी हमारे गांव में यह त्योहार नहीं पहुंचा था।
1973 में जब मैंने जलसेना में योगदान दिया , तब ट्रेनिंग के दौरान देखा कि उत्तर - पश्चिम भारत के साथियों के पास डाक से राखियाँ आती हैं । चूंकि इस त्योहार से मेरा कोई विशेष जुड़ाव न था , मैं निर्लिप्त भाव से साथियों की कलाई में बँधी राखियों को देखता रहता ।
इस बीच दूरदर्शन ने बड़े शहरों में दस्तक दिया और उसके बाद यह त्योहार कम से कम हमारे देश के सभी शहरों का त्योहार बन गया । फिर कारोबारियों की नजर इस पर पड़ी और उन्हें इस त्योहार में अपना भविष्य दिखाई दिया । रेडियो - दूरदर्शन पर एक पखवारे पहले से विज्ञापनों की झड़ी लग गई । प्रचार के इन माध्यमों से राखी का त्योहार सुदूर ग्रामीण इलाकों तक जा पहुँचा और भाई - बहन के पवित्र बंधन का यह त्योहार आज देश के प्रत्येक परिवार तक जा पहुँचा है ।
किंतु आज , यह सिर्फ एक धर्म का त्योहार बनकर रह गया है । कोई कर्मावती और कोई हुमायूँ हमारे बीच वैसा उदाहरण पेश करते नहीं दिखता ! तब से अब तक हुई सियासत ने इनके बीच मजहबी नफरत की एक ऊँची दीवार खड़ी कर दी है । हो सकता है कि आनेवाले दिनों में यह दीवार टूटे और दोनों कौमों के भाई बहन एक दूसरे की कलाई पर राखी का पवित्र और अटूट धागा बाँधें !
उनदिनों नाटक की पतली पतली किताबें जो हमें मिलती थीं , वे थीं -- सुल्ताना डाकू , दमाद वध , अरावली का शेर , हल्दीघाटी का शेर , आहूति , दानी कर्ण , चंद्रगुप्त आदि । जहाँ तक मुझे याद है , इनके लेखक थे -- चतुर्भुज । ' आहूति ' (शायद यही नाम था) नाटक , जिसमें रानी कर्मावती और हुमायूँ के जीवन की कुछ झलकियां थीं , खेलते समय पहली बार मैंने राखी या रक्षाबंधन सुना था । उस नाटक में मैं भी एक पात्र की भूमिका निभा रहा था । आपको हँसी आएगी , यह जानकर कि उस समय हमारे गाँवों में मंचित नाटकों में औरत की भूमिका भी मर्द / लड़का ही निभाया करता था , क्योंकि बहुत ही कम लड़कियाँ या औरतें शिक्षित होती थीं । और , जब पढ़ाई पर ही इतनी रोक थी , तो मंच पर अभिनय करना तो बहुत दूर की बात थी । चूंकि मेरी उम्र कम थी और अभी चेहरे पर मूँछें नहीं उगी थीं , मुझे कर्मावती की भूमिका निभानी पड़ी थी ।
चित्तौड़गढ़ की सत्ताशीन रानी कर्मावती विधवा थी । उसके राज्य पर पड़ोसी राज्य गुजरात का राजा बहादुर शाह हमला कर देता है । रानी कर्मावती हुमायूँ से मदद चाहती है । वह हुमायूँ के पास राखी भेजकर आग्रह करती है कि इस बहन की रक्षा करे । यहाँ हुमायूँ ने इतिहास में एक अद्वितीय नजीर पेश किया है और इससे यह भी पता चलता है कि उन दिनों राजाओं के बीच मित्रता और शत्रुता का आधार धर्म नहीं होता था । एक हिंंदू बहन की लाज की रक्षा करने हेतु एक मुसलमान भाई युद्ध के मोर्चे को छोड़कर भागा चला आता है । तब वह किसी और मोर्चे पर युद्धरत था । किंतु , उसको पहुँचने में थोड़ी देर हो जाती है और वीरांगना कर्मावती अपना जौहर कर चुकी होती है । वह महल की तमाम स्त्रियों के साथ जलते कुंड में कूदकर अपने प्राण की आहूति दे देती है । अद्भुत घटना थी यह । देर से पहुँचा हुमायूँ बहन द्वारा भेजी गई राखी की लाज नहीं निभा पाने से दुखी होता है और उसका बदला गुजरात के उस बादशाह को युद्ध में हराकर लेता है तथा चित्तौड़गढ़ रानी कर्मावती के बेटे को सौंप देता है ।
जब मैं कॉलेज में पढ़ने पहुँचा, तब रंगमंच से लगाव के कारण फिल्मों की ओर आकर्षित हुआ । कई फिल्मों में मैंने रक्षाबंधन के दृश्य देखे । तब भी हमारे गांव में यह त्योहार नहीं पहुंचा था।
1973 में जब मैंने जलसेना में योगदान दिया , तब ट्रेनिंग के दौरान देखा कि उत्तर - पश्चिम भारत के साथियों के पास डाक से राखियाँ आती हैं । चूंकि इस त्योहार से मेरा कोई विशेष जुड़ाव न था , मैं निर्लिप्त भाव से साथियों की कलाई में बँधी राखियों को देखता रहता ।
इस बीच दूरदर्शन ने बड़े शहरों में दस्तक दिया और उसके बाद यह त्योहार कम से कम हमारे देश के सभी शहरों का त्योहार बन गया । फिर कारोबारियों की नजर इस पर पड़ी और उन्हें इस त्योहार में अपना भविष्य दिखाई दिया । रेडियो - दूरदर्शन पर एक पखवारे पहले से विज्ञापनों की झड़ी लग गई । प्रचार के इन माध्यमों से राखी का त्योहार सुदूर ग्रामीण इलाकों तक जा पहुँचा और भाई - बहन के पवित्र बंधन का यह त्योहार आज देश के प्रत्येक परिवार तक जा पहुँचा है ।
किंतु आज , यह सिर्फ एक धर्म का त्योहार बनकर रह गया है । कोई कर्मावती और कोई हुमायूँ हमारे बीच वैसा उदाहरण पेश करते नहीं दिखता ! तब से अब तक हुई सियासत ने इनके बीच मजहबी नफरत की एक ऊँची दीवार खड़ी कर दी है । हो सकता है कि आनेवाले दिनों में यह दीवार टूटे और दोनों कौमों के भाई बहन एक दूसरे की कलाई पर राखी का पवित्र और अटूट धागा बाँधें !
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