यह तुम नहीं , तुम्हारा अहंकार बोल रहा है , जो ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं, सर्वव्यापी हैं , सबका पालनहार हैं (?) , उन्हें टाट की छावनी से रत्नजड़ित महल में तुम ला रहे हो ! है न यह तुम्हारी धृष्टता या धूर्तता ! अरे भाई , तुम हो क्या चीज , जो ब्रह्माण्ड के मालिक के सिर पर छत प्रदान कर सको ? यह तुम्हारी झूठी हेकड़ी है , जिसकी घोर निर्लज्जता से प्रदर्शन कर तुम हम पर अपनी धाक जमाना चाहते हो , रौब गांठना चाहते हो और चाहते हो कि हम इस एक सुकृत्य (?) के एवज में तुम्हारे सारे कुकृत्यों को भूल जाएँ । तुम्हारी सारी गलतियों को माफ कर दें ।
हम भूल जाएँ कि तुम्हारे एक गलत कदम , विमुद्रीकरण , के कारण लाखों लोगों ने अपना रोजगार खो दिया । देश की पूरी अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई । छोटे - बड़े कई उद्योग - धंधे बंद हो गए । जीएसटी में असंगतियों एवं खामियों के कारण व्यापार में गंभीर मुश्किलें पैदा हुईं और उसकी रफ्तार धीमी हो गई । भूल जाएँ कि राष्ट्रीय यानि जनता की सम्पत्ति को औने - पौने दामों में तुमने अपने खास दोस्तों के हाथों बेच दिये और बेच रहे हो ।भूल जाएँ कि तुम्हारे सारे ही वादे जुमले निकले । भूल जाएँ कि दो करोड़ प्रतिवर्ष रोजगार देने की बजाय तुमने हमारी नौकरियाँ ही छीन ली । भूल जाएँ कि हमारे घरों के छप्पर - छानी तो जर्जर होकर धराशायी हो रहे हैं और तुम्हारी पार्टी के सैंकडों वातानुकूलित दफ्तर खड़े हो रहे हैं । भूल जाएँ कि पुलवामा की घटना की जाँच रिपोर्ट अबतक नहीं आई है , जिसमें हमारे कई बच्चे शहीद हुए थे । भूल जाएँ कि जब सारी दुनिया कोरोना से लड़ने और बचने की तैयारी कर रही थी , तो तुम अपने प्रिय दोस्त के साथ अहमदाबाद के स्टेडियम में लाखों लोगों का जमावड़ा लगाकर " नमस्ते ट्रंप " कार्यक्रम का आयोजन कर रहे थे और उससे फुर्सत मिलते ही एक राज्य की चुनी हुई सरकार को धनबल की बदौलत अपदस्थ कर अपनी सरकार बनाने में मशगूल हो गए थे । भूल जाएँ कि फिर अचानक ही सिर्फ चार घंटे की मोहलत देकर तुमने संपूर्ण देश में तालाबंदी कर दी । संपूर्ण राष्ट्र एकाएक लकवाग्रस्त सा हो गया । जो जहाँ , जिस हाल में था , उसी हाल में रहने को विवश हो गया । जब पहली दफा की 21 दिनों की अवधि को तुमने बढ़ाया , तो शहरी मजदूरों को रोटी के लाले पड़ गए । उद्योग-धंधा तथा सारी व्यापारिक गतिविधियों के बंद होने से उनकी आय बंद हो गई । मकान मालिकों ने मकानों से निकलने की नोटिस थमा दी । आवागमन के सारे साधन के स्थगित होने के कारण लाखों लोग शहरों से पैदल ही अपने गाँवों की ओर चल पड़े । रास्ते में वे लोग पुलिसिया जुल्म के शिकार तो हुए ही , भूख और दुर्घटनाओं के कारण सैंकड़ों की जानें गईं । भूल जाएँ कि इस लॉकडाऊन के दौरान तुमने तीन -तीनअध्यादेशों के जरिए किसानों को भूमिहीन मजदूरों में तब्दील होने का पूरा इंतजाम कर दिया है । भूल जाएँ कि श्रम कानूनों को मालिकों के पक्ष में परिवर्तन कर तुमने श्रमिकों को निर्दयी और जालिम मालिकों के रहमोकरम पर छोड़ दिया है । पीठ पर पड़े लात तो भूल भी जाते , पर पेट पर पड़े लात को हम कैसे भूलेंगे। यह सब याद रखा जाएगा , सा'ब जी !
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