अन्नदाता
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रोटी खातिर गए हैं बच्चे
घर में इनको छोड़
शहर की ओर ....शहर की ओर
रूठे दिवस हैं रूठीं रातें
झूठे रिश्ते , झूठी बातें
भीगी रहतीं सदा हीं पलकें
झर-झर झरते लोर
शहर की ओर .......
सब दुत्कारे कौन पुकारे
बाबा कहकर कौन दुलारे
जलती अँतड़ी दिखती ठठरी
दुख का है ना छोर
शहर की ओर..........
बादल आकर इन्हें हैं छलते
बैठ खेत में हाथ ये मलते
सावन-भादो बनती अँखियाँ
देख गगन की ओर
शहर की ओर.........
जो आता इनको भरमाता
जाति-धरम की घूँट पिलाता
सत्ता का ये मरम न समझें
इस पर रहता जोर
शहर की ओर.........
जब तक एक नहीं ये होंगे
जाति- धरम में बँटे रहेंगे
तबतक इनके हक की चोरी
करते रहेंगे चोर
शहर की ओर .......शहर की ओर
रोटी खातिर गए हैं बच्चे
गाँव में इनको छोड़
शहर की ओर .....शहर की ओर
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