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बेहाया



टूटल घर के छप्पर - छानी
बुढ़वा काट रहल हे चानी

बंगला, गाड़ी सब सरकारी
मशरूम के खाये तरकारी
लाखों के तो पियलक पानी
बुढ़वा काट ................

अरबों खर्चा करके उड़लक
एने - ओने  सगरे   घूरलक
मौज उड़ाके करे फुटानी
बुढ़वा काट .................

बइठल बइठल जब सनक हे
आठ  बजइते  आ  धमक हे
कर दे हे कुछ भी मनमानी
बुढ़वा काट रहल...............

 चढ़ सरहद पर खूबे गरजल
जाने केकरा पर हल बरसल 
लउटल त ढुंक गेल चुहानी
बुढ़वा काट .....................

चारो ओर अन्हरिया छयलक
घर बइठल ऊ मोर नचयलक
जग हँसइत हे देख नदानी
बुढ़वा काट ....................

लइकन सब के खा गेल नोकरी
हमनी सब के चर गेल धोकड़ी
मुँह से छिनलक रोटी - पानी
बुढ़वा काट .....................
( धोकड़ी = जेब )
     ----- कुमार सत्येन्द्र

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