भेलपुरी , पानी और चौपाटी
बात 1976 - 77 की है । तब आज की तरह बोतलबंद पानी छोटी - बड़ी गुमटियों पर नहीं बिकता था । हम चार - पाँच साथी मुंबई ( तब की बम्बई ) में मैरिन ड्राइव से चौपाटी की ओर पैदल जा रहे थे । दोपहर का समय था । धूप बहुत कड़ी थी । चौपाटी पहुँचते - पहुँचते सबका गला सूख गया था । हमने भेलपुरी के रेड़ी के सामने पेड़ के नीचे बड़े - बड़े घड़ों में पानी रखा देखा । ऊपर से लाल कपड़ा से ढका हुआ । हमने आपस में मशविरा किया कि वैसे तो भइया पीने के लिए पानी नहीं देगा । चलो , पहले भेलपुरी खाते हैं , तब तो पानी पिलाएगा । हमने रेड़ी के पास जाकर एक एक प्लेट भेलपुरी का आर्डर दिया । भइया के हाथ तेजी से चलने लगे । भेलपुरी चटक तो था ही , काफी तीखा भी था । हम सबने खाकर दो - दो या तीन - तीन गिलास पानी पिये । एक साथी ने भेलपुरी का बिल चुकाया और हम सब वहाँ से चल दिये । चार कदम भी नहीं गए होंगे कि पीछे से आवाज आई -- " ऐ बाबूजी ! और हमरा पैसवा के देगा ..? "
मैंने पीछे मुड़कर देखा । पानी पिलाने वाला हमारी ओर बढ़ा आ रहा था । मैंने भेलपुरी वाले की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि डाली । उसने हँसते हुए कहा -- " हाँ , बाबूजी ! पानी उसीका है ... दे दीजिए गरीब को।"
पानी का पैसा ! पानी भी बिकता है क्या ? हम आश्चर्यचकित हो एक - दूसरे का मुँह देखने लगे । मैंने पानी वाले को घूरते हुए कहा -- " तुम्हें पानी पिलाने के पहले बोलना था कि पानी का....। हम शायद कम ही पानी पीते ।"
" बाबूजी ! आपको भी तो पूछना चाहिए था ....यह बंबई है बाबूजी , यहाँ कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता । "
हम ठगे से खड़े एक दूसरे का मुँह देख रहे थे । उसके कहे मुताबिक प्रति गिलास पानी का पैसा चुकाया और भारी मन से आगे बढ़ गए । सबकी हलक फिर से सूखने लगी थी ।
वो दिन और आज का दिन , कितना फर्क आ गया है ! शहरों में आज हम सभी पानी खरीद कर पी रहे हैं । पर , मन में कोई खटका नहीं होता।
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