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जाति-धर्म-वर्ग और चुनाव

जाति - धर्म - वर्ग और चुनाव

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने देश को संविधान सौंपते हुए कहा था कि यदि हमारे देश में शीघ्र ही सामाजिक एवं आर्थिक समानता नहीं कायम की गई, तो सिर्फ राजनीतिक समानता हमारे लोकतंत्र को सुरक्षित नहीं रख पाएगी । आज आजादी के सात दशक बाद उनका कथन सच साबित होता दीख रहा है । लोकतंत्र के चारो खंभों की चूलें हिल गई हैं और सभी लोकतांत्रिक संस्थाएँ आखिरी साँसें गिन रही हैं । चुनाव एक मजाक बनकर रह गया है और ' जिसकी लाठी उसकी भैंस ' वाली कहावत चरितार्थ हो रही है ।
जाति और धर्म सदियों से हमारे सामाजिक ताने-बाने के अभिन्न अंग रहे हैं । आज इनका जबर्दस्त इस्तेमाल सियासत में किया जा रहा है । अधिकांश राजनीतिक दल जातीय एवं धार्मिक आधार पर ही अपने उम्मीदवारों का चयन करते हैं और इनका ध्रुवीकरण कर चुनावों में लाभ उठाते हैं ।
हलांकि , आजादी के बाद सामाजिक एवं आर्थिक समानता कायम करने हेतु ,आधे - अधूरे मन से ही सही , कुछ कदम उठाए गए थे । किंतु , शासकवर्ग की अनिच्छा के कारण कानूनी प्रावधानों को भी अमली जामा नहीं पहनाया जा सका । आरक्षण तथा भूमि सुधार जैसी बुनियादी परिवर्तन करने वाली योजनाएं अधूरी ही रह गईं । वाम मोर्चा शासित तीन राज्यों को छोड़कर अन्य किसी भी राज्य में भूमि सुधार सख्ती से लागू नहीं किया जा सका । इधर पिछले तीन दशकों से लागू की गई नई उदारवादी आर्थिक नीतियों ने तो इस दिशा में आजादी के बाद अर्जित सभी उपलब्धियों  पर ही पानी  फेर दिया  । इन नीतियों के कारण न केवल आर्थिक असमानता की खाई गहरी हुई है , बल्कि देश के सारे आर्थिक संसाधनों पर चंद लोगों या कॉरपोरेट कंपनियों का कब्जा हो गया है और हो रहा है ।
       हम सभी जानते हैं कि देश के आर्थिक संसाधनों तथा उनसे हो रहे उत्पादन व वितरण की कुंजी सत्ता के पास होती है और लोकतंत्र में सत्ता जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के हाथ में होती है । हम यह भी जानते हैं कि सत्ता का सोचने , नीतियां बनाने तथा उनके क्रियान्यवन करने का एक वर्गीय दृष्टिकोण होता है । जिस वर्ग की सत्ता होती है , वह उसी वर्ग के हित में कार्य करती है । यदि सत्ता बड़े पूंजीपतियों, व्यापारियों और औद्योगिक घरानों की है , तो निश्चित ही उनके हित में काम करेगी और यदि मजदूरों, किसानों, कर्मचारियों, छोटे छोटे व्यापारियों या उद्यमियों की है , तो इनके हित में काम करेगी । सत्ता में किस वर्ग की नेतृत्वकारी भूमिका होगी , लोकतंत्र में इसे तय करने का काम जनता की ही होती है । वह चुनाव में मताधिकार का प्रयोग करके अपना प्रतिनिधि चुनती है ।

 और , यहीं शुरू होता है पैसे का खेल । वर्षों से लंबित चुनाव सुधार न होने के कारण चुनाव प्रणाली की त्रुटियों का लाभ प्रभुवर्ग को मिलता है और वह आर्थिक संसाधनों की बदौलत मीडिया पर कब्जा करके झूठे और लोकलुभावन विज्ञापनों द्वारा भ्रामक प्रचार कर चुनावी संतुलन को अपने पक्ष में झुकाने में सफल हो जाता है । ऐसे में समान अवसर (लेवल प्लेइंग फिल्ड) की अवधारणा पूर्णतः बेमानी हो जाती है । चुनाव का आधार वर्गीय न होकर जातीय या धार्मिक हो , यह भरपूर कोशिश की जाती है । पिछले तीन दशकों से धार्मिक भावनाओं को भड़का कर मतों का  ध्रुवीकरण करने की प्रवृत्ति अपने चरम पर है । चूंकि हमारा समाज सदियों से जाति और धर्म से भावनात्मक रूप से बुरी तरह जुड़ी है , लोग अपने वर्ग हित को नहीं समझ पाते और जातीय व धार्मिक भावनाओं में बहकर जाने - अनजाने अपना ही अहित कर बैठते हैं । एक ही जाति व धर्म के अमीर किसानो, व्यापारियों, उद्योगपतियों और भूमिहीन - गरीब किसानों, फुटपाथी दूकानदारों, अत्यंत छोटे व्यवसायियों के हित एक समान कैसे हो सकते हैं ? किंतु , चुनाव के दौरान हम भावनाओं में बहकर इस फर्क को भूल जाते हैं या हमारी भावनाओं को भड़का कर हमें गुमराह कर दिया जाता है । नतीजतन , समाज के प्रभुत्वशाली लोग चुनाव जीत संसद एवं विधानसभाओं में पहुँच जाते हैं ।ऐसी स्थिति में , जाहिर है कि वे अपने वर्गहित में ही सारी नीतियाँ बनायेंगे और देश के संसाधनों का इस्तेमाल  अपने वर्ग के विकास में करेंगे ।
            अभी हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा आनन - फानन में लोकतंत्र की हत्या कर पारित कृषि संबंधी तीन विधेयक हों या संसद के दोनों सदनों में पूरे विपक्ष की अनुपस्थिति में पारित किये गए श्रम सुधार विधेयक , इस बात के द्योतक हैं कि पूंजीपतियों के दलाल जब सत्ता में पहुँच जाते हैं , तो किस तरह अपने वर्गहित में उन संस्थाओं पर भी बुलडोजर चला देते हैं , जिसकी रक्षा करने की शपथ लेकर वे सत्ताशीन होते हैं । यह घटना मजदूरों, किसानों, कर्मचारियों, छोटे व्यवसायियों की आँख खोलनेवाली घटना है । आज हमें इस बात को समझने की अत्यंत आवश्यकता है , वरना हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इन कॉर्पोरेट कंपनियों का गुलाम बनकर रह जायेंगी । भले ही वो कंपनियाँ देशी ही क्यों न हों ।
                               उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में बिहार के या अन्य राज्यों के आसन्न चुनावों में हम सभी मेहनतकशों को , जो कि प्रतिदिन खटकर खाते हैं , सतर्क और जागरूक होने की जरूरत है । हमें उन दलों के उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने की जरूरत है , जो आज संघर्षों में हमारे साथ खड़े हैं और जिनकी नीतियाँ मजदूरों, किसानों, कर्मचारियों एवं शोषित - पीड़ित जनता के पक्ष में विकास की दिशा मोड़ने की है , जो सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था को मजबूत करने और सर्वसुलभ बनाने की घोषणा करे । सभी की योग्यता के अनुरूप रोजगार की गारंटी करे और बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति होने लायक मजदूरी का प्रावधान करे । जो श्रम कानूनों को श्रमिक हितों के तथा कृषि नीति को किसानों के पक्ष में बनाने तथा उन पर अमल करने की घोषणा करे । सबसे जरूरी बात है कि हम चुनाव में जाति , धर्म या क्षेत्र जैसी भावनात्मक मुद्दों की बजाय वर्गीय मुद्दों पर अपना कीमती मत दें ।

        --- कुमार सत्येन्द्र

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