मैं जानता हूँ
तुम अब भी नहीं मानोगे
कि तन गई है चारो ओर
झूठ की काली चादर
मृगतृष्णा में जी रहे हो तुम
अपना ही लहू पी रहे हो तुम
मैं जानता हूँ
तुम अब भी नहीं मानोगे
कि तुम अंदर तक छीजे हुए हो
लुटता चमन देखकर
बिकता वतन देखकर
खुद से ही खीझे हुए हो
मैं जानता हूँ
तुम अब भी नहीं मानोगे
कि तुम से हुई थी भूल
तुमने चुन लिया था जिसे
समझकर फूल
चुभ रहा है वही हिय में
बनकर तीक्ष्ण शूल
मैं जानता हूँ
तुम अब भी नहीं मानोगे
कि अतीत के व्यामोह में
घुसते जा रहे हो अकारथ ही
अंतहीन अँधेरे खोह में
यह जानते हुए कि
जो भी वहाँ जाता है
कभी लौटकर नहीं आता .
मैं जानता हूँ
तुम अब भी नहीं मानोगे
कि हवा जहरीली हो गई है
और तुम्हारा फेफड़ा
छलनी हो गया है
बमुश्किल ले रहे हो साँस
फिर भी लगाए बैठे हो
ठूंठ से आस.
---- कुमार सत्येन्द्र
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