एक खत रिया के नाम
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मिलन का वह प्रथम क्षण
याद है तुम्हें
कौन सा मुहूर्त था
कौन सी घड़ी
जब चार हुई थीं तुम्हारी आँखें
उफनता समंदर सा महसूसा था तुमने
या उठा था कोई झंझावात
या कि दिल अँटक कर
भटक गया था उसकी आँखों में
क्या हुआ था
कुछ याद है तुम्हें ?
क्षण भर के मिलन का
फिर हुआ होगा विस्तार
मिनटों , घंटों , हफ्तों और महीनों में
तब क्या जानती थी तुम
कि अनायास ही फंसी जा रही हो
किसी खतरनाक दलदल में ?
उन्मुक्तता की , स्वच्छंदता की
कोई सीमा नहीं होती ,
स्वतंत्रता की होती है
स्वाधीनता की भी ,
वरन् समाज उच्छृंखल हो जाता
और दरक कर टूट जाता ।
अनुशासन के कड़े नियमों से
बँधी रही थी पिता की जिंदगी
शायद इसीलिए , नहीं समझा उचित
बाँधना परिवार को कड़े बंधनों में
कुछ प्रभाव
बदलते वक्त का भी रहा होगा
युवाओं की ऊँची उड़ान
आकाश ही है उनकी सीमा ,
पर , अनुभव बताता है कि
बहुत बारीक रेखा होती है
स्वतंत्रता व स्वच्छंदता के बीच
उसका अतिक्रमण हो सर्वथा ही वर्जित
ऐसा मैं नहीं कह सकता
वरना कहेंगे लोग
मैं विरोधी हूँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ,
पर,उन्मुक्त समाज के भी
कुछ तो कायदे होने चाहिए न !
चारो ओर से उठती ऊँगलियों के बीच
जब देखता हूँ मैं तुम्हें
फड़फड़ाते घायल पक्षी की तरह
सिहर उठता हूँ
समाज का इतना भयावह चेहरा !
पर,दोषी हम ही तो हैं
हमने ही तो निर्मित किया है
ऐसा क्रूर समाज
तय किये हैं इसकी मर्यादाएं
बनाये हैं मूल्य और मापदंड
वह पुरूष था
पुरूष , जो होता है सदा ही
निर्दोष , निष्कलंक, निष्कलुष
पवित्र गंगाजल सा ,
कोई दाग - धब्बा नहीं लगता उससे
खानदान या समाज के दामन पर
बेदाग रखने की सारी जिम्मेदारी
होती है स्त्रियों की ,
याद करो सीता को , अहिल्या को
अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा तुम्हें ही
न कोई इन्द्र से पूछेगा सवाल
न ही राम - रावण से ,
तुम्हारे जिस्म से बँधी हैं
समाज की सारी मर्यादाएं
वही जिस्म
जिसे नोच खाने को रहते हैं आतुर
समाज के भेड़िए ,
यह कैसी विडंबना है
कि भेंड़ियों की भूख भी तेरा जिस्म है
और उनकी मर्यादा भी !
पर, सावधान लड़की !
न तो तुम सीता की तरह देना
अग्नि परीक्षा
और न ही बनना पाषाण
तुम रणचंडी का रूप धरना
दुर्गा - काली सा हुंकार भरना
निर्भय होकर टकराना
इन क्रूर आततायियों से
जो चाहते हैं बनाना तुम्हें
शतरंज का एक मोहरा
हाँ , मोहरा
क्योंकि चल रहा है खेल
शह और मात का
अकूत खजाने पर कब्जे का
बॉलिवुड की बादशाहत का
तुम्हारा प्रेम यदि सच्चा था
निश्छल , निष्कपट था
तो जीत तुम्हारी होगी
तुम बेटी हो एक बहादुर बाप की ,
उस बाप की
जिसने फक्त अपनी नहीं
अपने परिवार की नहीं
संपूर्ण राष्ट्र की मर्यादा की रक्षा की है
डरो मत इन बिके हुए अखबारनवीसों से
इन जर-खरीद गुलाम खबरचियों से
मत होना हताश और निराश
कभी भी टूटना मत
अडिग रहना अपनी सच्चाई पर
पूरी निर्भिकता से , पूरी दृढ़ता से
कि प्रेम और युद्ध में होता है जरूरी
दृढ़ संकल्प और पूर्ण समर्पण ।
----- कुमार सत्येन्द्र
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