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"सूर्पणखा"


पुस्तकः सूर्पणखा (खण्ड काव्य)
लेखकः गोपाल प्रसाद
प्रकाशनः जनसाहित्य संस्थान, बोकारो स्टील सिटी
प्रकाशन वर्षः 1986 (अगस्त)
समीक्षकः डाॅ अली इमाम खाँ
‘‘नारी स्मिता, सम्मान और संघर्ष की गाथा है सूर्पणखा’’
‘समता, स्वतंत्रता और न्याय के पक्ष में एक मजबूत आवाज़ है सूर्पणखा, जगत की वैज्ञानिक व्याख्या की पक्षधर और वैज्ञानिक सोच की समर्थक’ भी।
गोपाल प्रसाद मित्र हैं, संगठन के साथी और जनसंघर्षों के हमसफर। उनका एक दर्द है और वह यह कि उनके खण्डकाव्य ‘सूर्पणखा’ को कोई तवज्जो नहीं दी गई जबकि मशहूर गीतकार ‘शील’ इसे पढ़ कर इसके छंदों से अभिभूत थे, भावविभोर होकर नाच उठे थे और लेखकों, कवियों को जमाकर कहा था कि देखो ऐतिहासिक भौतिकवाद को किस तरह छंदों में बांधा है कि आम आदमी इसे समझ जाए पर, इस पर  लिखा कुछ नहीं। हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार, समालोचक डाॅ0 शिव कुमार मिश्र इस खण्डकाव्य पर लिखते-लिखते रह गये। साहित्यिक गोष्ठी में चर्चा तो हुई पर बात आगे नहीं बढ़  सकी। मैंने बातों-बातोंमें उनसे कहा था कि मैं ‘सूर्पणखा’ को पढ़ने की कोशिश करता हूँ पर बीच में अटक जाता हूँ। वजह संस्कृतनिष्ठ शब्दों का इस्तेमाल। लेकिन वादा है कि पढूँगा जरूर, फुर्सत में बड़े ध्यान से और जब पढ़ूँगा तो लिखूँगा भी। आज यह वादा लगभग 33 वर्षों के बाद पूरा होता नजर आ रहा है।
हिन्दी साहित्य में ‘प्रबंध काव्य’ की परंपरा बहुत पुरानी है। इसके भिन्न-भिन्न रूपों में ‘महाकाव्य’ और ‘खण्डकाव्य’ दोनों आते हैं। संस्कृत भाषा में महाकाव्य की परंपरा बहुत ज़्यादा पुरानी है। वाल्मीकि रामायण इसी कोटि में आता है। सूर्पणखा का भी आधार यही है, वैज्ञानिक सोच और आधुनिक व्याख्या इसके सहायक तत्त्व हैं। वैसे महाकाव्य विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। भारत के अलावा ग्रीक साहित्य में होमर का ‘इलियड’ और ‘ओडीसी’, इरान में फ़िरदौशी का ‘शाहनामा’, मिस्रमें ‘स्टोरी आॅफ़ ए रेकेड शिप’ अपने समय के दर्शन, मिथ और विश्वास को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करने में कामयाब हैं। रामायण और रामकथा की पहुँच और स्वीकार्यता तो भौगोलिक, भाषायिक और सांस्कृतिक सीमा से परे है। और हर क्षेत्र, भाषा और संस्कृति में इसका स्वरूप अलग हो जाता है वहाँकी सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताओं को अपने में समेट कर और यही इसकी जीवंतता का सबूत है। सिनेमा हो कि स्टेज, अनिमेशन हो कि वेब सभी के लिए रामायण और रामायण कथा प्रिय विषय रहे हैं और आज भी हैं। रामायण के पुर्नकथन भी अनेक हैं जिनमें अलग-अलग विचार, आदर्श के मापदंड, जीवन शैली के नमूने और जीवन दृष्टि देखने को मिलती है। उनके सरोकार और व्यवहार भी अलग हो जाते हैं। नाटक में तमिल अभिनेता आर.एस. मनोहर ने रामायण का पुनर्कथन रावण के दृष्टिकोण से किया है, वहीं नीना पाले ने रामायण का पुनर्कथन सीता के दृष्टिकोण से, जिसमें सीता को ब्लू गाते हुए दिखाया गया है। स्टार प्लस नामक टीवी चैनल ने 2015 में ‘सिया के राम’ के नाम से शृंखला प्रदर्शित की जो सीता के दृष्टिकोण से रामायण का पुनर्कथन है। कलाकार विजय गोयल और साहित्यकार विजेंद्र मोहंती ‘रावणायण’ नाम की हास्य शृंखला के साथ आए जिसे काफ़ी सराहा गया। इसी कड़ी में अशोक बंकर का भी रामायण का पुर्नकथन है जो राम के दृष्टिकोण से लिखा गया है। इस भूमिका की सार्थकता इस सच्चाई में है कि रामायण और राम कथा अनेक हैं और अलग-अलग दृष्टिकोण पर आधारित हैं। इस तरह 300 रामायण के साक्ष्य मिलते हैं, अधिक भी हो सकते हैं। यह तो खोज और शोध का मामला बनता है। सूर्पणखा खण्डकाव्य है और खण्डकाव्य के सभी निर्धारित मापदंडों पर खरा उतरता है।
गोपाल प्रसाद रचित खण्डकाव्य की नायिका है सूर्पणखा। उसके रंग रूप, शौर्य, विचार, आदर्श और उद्देश्य का वर्णन खण्डकाव्य के आरम्भ में ही उसकी प्रस्तावना में स्पष्ट तौर से किया गया है। वह भेदभाव और विषमता मिटाना चाहती है, देव-दानव के भेद को मिटाकर मानव की पहचान मानव के रूप में चाहती है।
’’वह चपल मृदुभाषिणी लेकिन निडर थी
सौम्यता की मूर्ति वह अनुपम सुघर थी
          ..........................
ढोंगियों का वह सफाया चाहती थी
देव-दानव एक हैं वह मानती थी
एक मानव जाति बस मानव सभी हैं
वर्गभेद तनिक कहीं भी तो नहीं है‘‘ (प्रस्तावना)
कथा आगे बढ़ती है। राम, सीता और लक्ष्मण वन में हैं। पंचवटी में कुटीर में वास है। राम स्थिति को समझ रहें है। अब न राज है और न राजदरबार और न ही उसका विशेष प्रयोजन। वन में रहना है तो वहाँ के लोगों से मिलकर रहना है। उन्हें अपना बनाना है। यह राजनीति भी है कूटनीति भी और समय की जरूरत भी। सीताके मनमें द्वंद्व है, एक धुंध है जिससे वह व्याकुल है। राम से पूछती हैं, उन्हें उनके कुल, उनकी मर्यादा और धर्म की याद दिलाती है।
‘‘ आपका यह वनगमन क्या इसलिए ही
है हुआ कि शूद्र जन से पय पिएँ ही?
ध्यान रघुपति का नहीं इस ओर है पर
कोल, भीलोंका गहा कर में सदा कर‘‘ (कुहासा)।
राम शांत हैं, अपने प्रयोजन को समझते हैं। धीर गम्भीर मुद्रा में कहते हैं-
‘‘मैं न भूला हूँ कि रघुवंशी तरुण हूँ
है मुझे यह ज्ञान भी मैं वह अरुण हूँ
है जिसे करना धरा को हीन ऐसे-
शूद्रजन से, मक्खियों से दूध जैसे’’ (कुहासा)।
मनु के विधान वर्णाश्रम को स्थापित करना है और उससे डिगा भी नहीं हूँ। पर इनका इतिहास भी जानता हूँ, इनका चरित्र और इनकी राज भक्ति भी। इनका ज्ञान, शौर्य और कौशल भी। इनसे मित्रता अपने हित में है और समय की माँग भी।
’’ वे बहुत रणबाँकुरे भी है, घनेरे
इन्द्र ब्रह्मा विष्णु अगणित बार हारे
काल सम विकराल भी दिखते सदा हैं
सींचते सुर-खून से धरती सदा है
इन अधम वनमानुषों से इसलिए ही
कर रहा हूँ मित्रता, अपने लिए ही‘‘ (कुहासा)।
यहाँ बात साफ़ हो जाती है कि उद्देंश्य जनकल्याण नहीं, अपना हित साधना है। यह मित्रता राजनीतिक तकाजों के तहत है। यह नैरेटिव स्थापित मान्यता से हट कर है। राजकीय कूटनीति का हिस्सा है।
’’बुद्धि-बल से पर विजय होती सदा है
इसलिए वनमानुषों का कर गहा है
ये सुपरिचित पूर्ण इस अज्ञात वन से
साथ सकते भी निभा तन और मन से
युद्ध कौशल में सभी के सब खरे हैं
मूर्ख हैं, अज्ञानता से तो घिरे हैं‘‘ (कुहासा)।
यह मित्रता संधि, मित्रता का व्यवहार सब युद्ध रणनीति का हिस्सा है और इसलिए जरूरी है।
खण्डकाव्य का अगला सर्ग राम और सूर्पणखा की मुलाकात, उनके संवाद और संलाप का है। यह संवाद देव-दानव, स्वामी-भक्त, देव-देवी का न होकर रघुवंशी राजकुमार राम और रक्षवंशी राजकुमारी सूर्पणखा के बीच है। अपने मानवीय कलेवर और स्वाभाविक वृत्ति में, अपनी-अपनी स्वायत्तता पर दोनों दृढ़। यह संलाप वर्चस्व और अधीनता के विचार और दर्शन को नकारता है। सूर्पणखा के सौंदर्य को देखकर राम भी हतप्रभ हैं।
‘‘सुघरतम सौंदर्य की ज्यों मूर्ति आयी
देख आँखें राम की भी चैंधियायी
राम अपलक देखते ही जा रहे थे
पर न निर्णय वे सही कर पा रहे थे
सप्त द्वीपाधीश रावण जग-जयी की
हूँ सुनो अनुजा, सुता माँ कैकसी की
स्वामिनी हूँ और, अधिष्ठात्री यहाँ की
रक्ष-धर्म अधीन वसुधा है जहाँ की’’ (संलाप)।
रक्ष-धर्म बराबरी का धर्म है जो देव-दानव, आर्य-अनार्य में अतंर नहीं करता है। सब के लिए समता और सम्मान का दर्शन है। और यही परंपरा का आधुनिक मूल्यांकन है, इसकी नयी व्याख्या है जो इसे अनुपम बनाती है।
‘‘ जो निरा निर्दोष थी रत कार्य में निज
त्ंाग करते थे मगर उसको सदा द्विज
धर्म का है लक्ष्य जग में अंधता को-
कर सफाया, है बढ़ाना एकता को
देव-दानव या न होंगे आर्यवंशी
भूल अंतर सब बनेंगे रक्षवंशी
इस विभाजन के अरे परिणाम लगते
नाग किन्नर दास दैत्यादित्य बनते
प्यास है सबको परस्पर पर लहू की
लूटते हैं लाज अपनी ही बहू की’’ (संलाप)।
एकरूपता और समरूपता का यह दर्शन खण्डकाव्य की प्रगतिशील विचारधारा से मेल नहीं खाता है एक कन्फ्यूजन को आख्यान के बीच ला खड़ा करता है। सूर्पणखा राम को देवों के छल, दमन और आघात की याद दिलाती है। यह अब नहीं चलेगा, इसके प्रति सावधान करती है।
‘‘ जो निरीहों का सदा करते हनन है
अश्व-गो के माँस भक्षक तो मगन हैं
मित्र दासों का रहा आदित्य हरदम
इंद्र का कर थामना क्या है कहो तुम?
वध किया छल से इसी ने दास-नेता
सुंदरी को क्यों कहो विष्णु ही लेता?
जिन कुकर्मों को अरे तुम कर रहे हो
क्यों उन्हें मत्थे हमारे मढ़ रहे हो ’’ (संलाप)।
यह संवाद सूर्पणखा के साहस, उसके बुद्धि विकास, उसके इतिहासबोध और अपने वर्गीय हित के प्रति सजगता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
अगला सर्ग ‘परिचय’ है। यह परिचय है मनु के विधान का, वर्णाश्रम पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का, भेदभाव पर टिकी सत्ता का, शूद्रों की दशा का, उनके साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार का और इस व्यवस्था को बदलने के संकल्प का। विज्ञान का नियम है कि पानी सदा ऊपर से नीचे की ओर बहता है इसके उलट नहीं। इसी प्रकार व्यवस्था बदलने का काम भी ऊपर से होता है।
‘‘है नियम ऐसा तरल जाता न ऊपर      
है सदा बहता अधोन्मुख नाथ! भू पर
मैं करूँगा नाश देवों का धरा से
फिर विषमता को मिटाऊँगा यहाँ से
क्या बुरा है चाहता सबको मिलाना
है सभी दायाद तो सबको दिलाना
चाहता अधिकार, जो है न्यायसंगत
दिख रहा कुछ भी नहीं मुझको असंगत
‘‘शूद्र की मैं क्या कहूँ क्या है व्यवस्था
दयनीय अतिहीन इनकी है अवस्था  
दंड केवल मृत्यु का इनके लिए है
कुछ अवस्था में रहम मनु कर दिये हैं
जानवर को भी बसाते साथ घर में
श्वान, बिल्ली खेलते भी संग घर में
नाग को भी है पिलाना दूध भाया
आदमी ने आदमी को पर भुलाया
श्रेष्ठ ब्राह्मण दूसरे ये क्षत्र-जन हैं
तीसरा है वैश्य चैथे शूद्रजन हैं
कौन सा अपराध शूद्रों ने किया है
दंड इतना घोर मनु ने जो दिया है
आह इनकी चाल है कैसी अनूठी
बात लम्बी गोल मतलब और झूठी
वर्णाश्रम ने शूद्रों की हालत जानवरों से भी बदतर कर दी है। जानवर प्यार और सम्मान पाते हैं पर शूद्र नहीं। वे केवल सेवा और दासता के लिए हैं क्योंकि धर्म यही कहता है पर अब लोग समझने लगे हैं, सच को जानने लगे हैं। धर्म की वास्तविकता उनके सामने है। यह शोषण का हथियार बनता रहा है। धर्म के तर्क पर भेदभाव, ऊँच-नीच, शोषण और उत्पीड़न को वैधानिकता मिलती रही है पर अब और नहीं। इसे बदलना है, अब उनकी चालें समझ में आने लगी हंै।
‘‘क्यों न मुण्डन माथ का सुर भी करावें
जब सदा ही झूठ की तारीफ पावें
देवताओं ने सदा जग को ठगा है
अब जगत इस सत्य को पहचानता है
आज सच्चाई जगत ने ही बताई
क्यों हुई है देव ब्राह्मण में मिताई
छत्रछाया, एक में ही सब चलेंगे
तब नहीं शोषक नहीं शोषित रहेंगे
काम में सबके सभी तब एक होंगे
भेद-मूलक भाव तज सब नेक होंगे’’ (परिचय)
फिर शिव की वंदना, घूम फिर कर धर्म की शरण और सबको अपने अधीन करने की कामना ऐसा लगता है चक्र घूम जाता है। यह भ्रम काल बोध का भी भ्रम हो सकता है।
‘‘वरदहस्त अगर तुम्हारा, शीश पर हो
पद सदा तब जुर्मियों के शीश पर हो’’ (परिचय)
और ऐसे में सूर्पणखा गर्व से भर जाती है।
जब यह समझ में आ जाये कि यह स्थिति क्यों? इसका ज़िम्मेदार कौन तो शुरू होता है संघर्ष, अपने अस्तित्व को बचाने का संघर्ष, अपने सपनों का संघर्ष। सूर्पणखा का भी संघर्ष कई स्तरों पर है- खुद से, परिवार से, सौमित्र लक्ष्मण से और फिर व्यवस्था से। इसलिए अगला सर्ग संघर्ष है। इस सर्ग की शुरूआत प्रकृति के चित्रण से है, इसके सौंदर्य का वर्णन अद्भुत है। मन मनोरम दृष्यों में खो जाता है। इतना मनोरम वातावरण, राम-सीता कुटी में हैं और लक्ष्मण कुटी के बाहर नितांत अकेले, विरह की घड़ी में बेचैन मन से उर्मिला को याद करते हैं। व्याकुल हो उठते हैं। सोचते हैं यह मुझे क्या हो गया है? लगता है मैं वह लक्ष्मण ही नहीं रहा। उर्मि की याद में कहीं खो जाते हैं। भावनाओं का आवेग है कि बढ़ता ही जा रहा है। विलक्षण चित्रण हैं-
शंभु भी खुद को बचा पाये न जिससे
पार पा सकता कहो फिर कौन उससे
उर्मिला की याद में जो जल रहे थे
भावना के कमल विकसित गल रहे थे
उर्मिले! होगी वहाँ कैसे अकेली
बात यह खलने लगी है बन पहेली
तप्त तेरे होंठ पर तेरेे नयन से-
बूंद पटकेगी नहीं क्या? तप्त मन से-
जब दमगती दामिनी घन के हृदय में
क्या न झंझावात उठता है हृदय में
क्या हुआ है आज मुझको, क्या कहूँ मैं
जान पड़ता है कि वह लक्ष्मण न हूँ मैं
यह अकेलापन बनाता आज जर्जर
है डिगा अबतक सके जिसको नहीं शर
काश! आकर तूँ अकेलापन मिटाती
बाहुओं का हार ग्रीवा में पिन्हाती
झूलते थे लखन सागर की लहर पर
जा रहे किस ओर थे ना ध्यान इस पर
सौंप खुद सौमित्र ऐसे ही शिला पर
भावनाओं की कली अगणित खिला कर
याद करते जा रहे थे उर्मिला की
लग रही उनके हृदय में आग जिसकी’’ (संघर्ष)
विरह की आग में जलते लक्ष्मण की भावना, मनोदशा और मनोविज्ञान का असाधारण वर्णन
लक्ष्मण उर्मिलाकी याद को सीने से लगाये शीला पर बेखुद पड़े हैं, ऐसे में सूर्पणखा का आगमन होता है। लक्ष्मण उसका सौंदर्य, उसकी अदा, उसकी छटा देखकर बस देखते ही रह जाते हैं।
‘‘क्षीण कटि उन्नत नितम्ब उरोज उभरे
गाल था वह लाल पूर्ण सरोज बिखरे
देखकर शोभा नखों की चाँद तारे-
भी धरा पर लोटते थे, नैन न्यारे-
थे, छटा बाँकी, अदा भी क्या अनोखी
कौन ऐसा धीर उसकी, देख शोखी-
नयन अविचल अधखुला सा मुँह पड़ा था
चकित मन सौमित्र का- जड़वत खड़ा था’’ (संघर्ष)
लक्ष्मण का हतप्रभ मौन, सूर्पणखा चंचल। अपनी चपलता में पूछती है।
‘‘बोलते हो क्यों नहीं क्या सोचते हो
क्यों पलक गिरती नहीं क्या सोचते हो‘‘
’’हूँ नहीं कुछ सोंच पाता देख तुझको
कौन हूँ क्या हूँ, नहीं है ज्ञात मुझको
पर तुम्हारा पूछने से क्या प्रयोजन
क्या बनोगी तूँ हमारी बोल जोगन’’ (संघर्ष)।
बस क्या था? सूर्पणखा का आत्मसम्मान भड़क उठता है और सौमित्र को ललकार उठती है।
‘‘क्या कभी तूने बिचारी आप हस्ती
जायेगी मिट एक पल में पूर्ण मस्ती
इन्द्र ने कल्याण समझा भागने में
सूर्य की गति मंद होती सामने में
ले संभल, आराध्य का अब ध्यान तूँ कर
‘देहि युद्धम’ और शर संधान भी कर’’ (संधर्ष)
यह ललकार थी या पौरुष का तिरस्कार? भावनायें तरंगित हो उठीं, उत्तेजना ने सर उठाया और धैर्य ने आपा खोया और फिर वह घटित हुआ जिसका तनिक आभास भी नहीं था।
बन, छलक जाता, गले से पार होता
भ्रष्ट हो तब आदमी व्यवहार खोता
कौन हूँ, क्या हूँ हमारा धर्म है क्या
भूल जाता आदमी तब कर्म है क्या
माथ पर जब वासना चढ़ बोलती है
कील वसुधा की सहज ही डोलती है
        ............................
लखन ने झट दे पछाड़ा और भूखे-
केसरी सम धर दबोचा, हाय! सूखे-
वृक्ष जैसा गिर गयी वह चरमराकर
चीख निकली एक फिर बेहोश होकर
हो गयी थी शाँत, वह निष्प्राण मानों
हो गया अंगार शीतल राख मानांे’’ (संघर्ष)
यह अपमान, ऐसा दंश कैसे झेला जाए, बात रावण तक पहुँची। लंकेश ने शपथ खायी।
‘‘पूर्ण तेरी मैं प्रतिज्ञा को करूंगा
मैं बचाने लाज अपनी मर मिटूंगा’’
नाक तेरी ही नहीं मेरी कटी भी
पूर्ण बदला बिन लिए रहना नहीं भीे
कौन भाई है धरा पर जो सहेगा-
बहन का अपमान जब बहता रहेगा-
खून धमनी में?- नहीं अधिकार उसको
बहन कहने का; अरी! धिक्कार उसको
तू बहन निश्चिंत रह दुःख दोहरा है
एक तेरा दुसरा भाई मरा है
मैं रहूँगा या रहेगा दाशरथि ही
है शपथ, साक्षी बनेगी पूर्ण महि ही (शपथ)
  वास्तव में सूर्पणखा का पूरा जीवन ही संघर्ष का जीवन रहा। लेकिन जिन कारणों से वैश्रवण रावण को शपथ लेनी पड़ी उसकी जड़ में भी सूर्पणाखा का दण्डकारण्य में अजनवी आगतों की रणनीतिक सच्चाई जानने का संघर्ष था जिसकी परिणति उसकी नाक कटने में हुई-
बात आद्योपांत सुनकर रक्ष बाला-
की/गले सौमित्र वैसे मारपाला
हो गया मानो कमल को।
और सहसा उन्हें तापसों की कही बातें याद आयीं
राक्षसों का तोड़ना बढ़ता हुआ बल
नहीं तो............
उदित होगा गगन में राक्षसों का सूर्य
इसीलिए-      
‘‘है अनार्यों का यहाँ करना सफाया
इसलिए ही तापसों ने तो बसाया’’ (संघर्ष)
आर्य-व्रात्यों का यहाँ पर छद्म सैनिक।
सूर्पणखा का संघर्ष यही नहीं समाप्त होता। अपने प्रेमी विद्युज्जिह्व को अपनाने के लिए वह संघर्ष लंकेश से भी करती है। रक्ष धर्म, तर्क और नीति से उसको सहमत कराती है।
‘‘जानती हूँ आपका बल और विक्रम
आप से कुछ भी न विद्युज्जिह्व पर कम
रक्त का कण एक भी जबतक रहेगा
नाम विद्युज्जिह्व का मुख यह कहेगा

तब जाकर रक्षपति ने हँस कर के अपनी सहमति जताई

‘‘है महा निर्भीक तूँ अतिशय निडर है
रक्षपति हंसकर कहे तूँ तो कहर है’’ (शपथ)
नारी स्मिता, स्वतंत्रता और सम्मान विद्युज्जिह्व की माता ‘विज्जला’ के चरित्र में भी उदात्त रूप  में प्रकट हुआ है।
विभीषण के समर्थन और सहयोग से राम विजयी होते हैं। लंका उजड़ जाती है। सूर्पणखा रोती बिखलती शोक संतप्त विभीषण के महल पहुँचती है। छल कपट से लंकेश बनने के लिए उसे धिक्कारती है। विभीषण क्रुद्ध होकर उसकी जान ले लेता है। सूर्पणखा का संघर्ष अंत तक चलता है बिना समझौते के। सच में वह नायिका का जीवन जीती है आत्मसम्मान के साथ बिन विचलित हुए, बिना डिगे।
‘‘उधर सूर्पणखा बिलखती शोक-दग्धित
जो गवाँ सब कुछ न पायी लक्ष्य लक्षित
           ...........................
जो अगर तू जानता है तो बता दे
ब्रह्मचारी तू दसानन सा दिखा दे
यह दसानन था कि सीता थी सुरक्षित
अन्यथा होती लुटी, रहती न रक्षित
जो अगर दुर्भावना होती हृदय में
तो नहीं रखते उसे रक्षा वलय में
पापियों को था यहाँ पर खींच लाना
जानकी का अपहरण तो था बहाना’’ (आरोहण)
‘‘वाक्य पूरा भी अभी तो हो न पाया
सनसनाता तीर उसमें जा समाया’ (आरोहण)। दसानन जैसा पराक्रमी, वीर, ज्ञानी, समानता का पक्षधर फिर इतना दुर्बल कैसे हो सकता है कि अत्याचार लक्ष्मण ने किया और अपहरण सीता का। बदला जाकर भी लिया जा सकता था, फिर बुलाने का बहाना क्यों? यह तो पुरुषवादी मानसिकता और सोच है जो प्रगतिशील नहीं कही जा सकती। हाँ! अंत में छंदों के माध्यम से सृष्टि की भौतिकवादी व्याख्या अद्भुत है जो प्रगतिवाद का द्योतक है।
‘‘जब नहीं कुछ था कहाँ ओंकार रहता
कुछ नहीं में क्या कहो विस्फोट करता
            .......................
पिंड सत है जो किया करता विघूर्णन
पिंड से ही शक्तिका होता विकीर्णन
......................................................................
पिंड का ही रूप मानव है जटिलतम
ऊर्मि आत्मा तंतु की ज्यों वाद्य-सरगम
....................................................................
ज्ञान से जो कुछ परे-किसको पता है
है अकल्पित जो कथन-सब धूर्तता है’’ (आरोहण)
खण्डकाव्य के छंद में गति है प्रवाह है। पर छंद का वजन बैठाने में कही भारी-भरकम शब्द के इस्तेमाल करने और कभी पूरी पंक्ति भरती कर डालने की विवशता के कारण प्रवाह भी वाधित होता है और पद की अर्थवत्ता भी। कोई एक बात एक पंक्ति के मध्य में शुरू होकर अगली पंक्ति में पूरी होती है, इसलिए समझ कर पढ़ने में बाधा उत्पन्न होती है। छपाई की क्वालिटी पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
यह खण्डकाव्य एक महिला के दृष्टिकोण से लिखा गया है और सूर्पणखा के पात्र को नायिका के तौर पर स्थापित करने में सफल है। यह सूर्पणखा की गौरवगाथा भी है शौर्यगाथा भी और सौंदर्यगाथा भी। रामकथा में एक अनूठा प्रयोग है और संदर्भगत अपने समय की व्याख्या एवं मूल्यांकन भी। रामायण के एक संदर्भ को लक्षित यह पुर्नकथन साहित्यकारों के बीच चर्चा का विषय बनेगा।







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