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ले मशाल वे निकल पड़े

खेतों-खलिहानों से बाहर , ले मशाल वे निकल पड़े
खानोंऔर खदानों से भी , ले मशाल वे निकल पड़े

वर्षों रह खामोश है झेली , सबने तेरी मनमानी
अब मंजूर नहीं है सहना , ले मशाल वे निकल पड़े

देश तरक्की करता नित-दिन ,जिनके खून - पसीने से
वे ही इसका मालिक होंगे , ले मशाल वे निकल पड़े

अशफाकउल्ला - भगत सिंह के ख्वाब अधूरे हैं अबतक
पूरा करने उसी ख्वाब को , ले मशाल वे निकल पड़े

मजहब - जाति में बिलगाकर , तूने उनको लूटा है
कायम करके देखो एका , ले मशाल वे निकल पड़े

धरती माँ की गोद में उनका बीता अबतक जीवन है
सो जायेंगे गोद में उसकी , ले मशाल वे निकल पड़े

रे हिटलर की औलादों ! क्या भूल गए तुम दिन अपने
हारे थे तुम , फिर हारोगे , ले मशाल वे निकल पड़े

---- कुमार सत्येन्द्र


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