गाँव
गाँव अब शहर से हो गए हैं
गड़ गए हैं बिजली के पोल
पगडंडियों पर बिछ गई हैं
अलकतरा से सनी गिट्टियां
जम गए हैं गर्द - गुबार अतीत के चिह्नों पर
खुली हवा अब नहीं रही स्वच्छ
भर गई है गाड़ियों के काफिले से उड़ी धूल
और आ रही है उससे साजिशों की बू
चढ़ गया है गाँव
किसी की नजर पर
चुभ रहे हैं सोना उगलते खेत
किसी की आँखों में
तीन दशक पहले बनी थी योजना
भोला-भाला गाँव
समझ नहीं पाया
उनकी गहरी चाल
ऊँची उड़ान की ललक में
खुद ही हो गया विस्थापित
कर गया पलायन शहर की ओर
शहर की परिधि पर
बस गईं गंदी - बजबजाती बस्तियाँ
वादों और आकड़ों के खेल में
उलझकर रह गया गाँव
अपने परिवर्तित रंग - रूप में
रिश्तों की नाजुक डोर छीजती गई
शहर की चकाचौंध में खो गया गाँव
रिक्त होती गई गाँव की गोद
उजड़ने लगे बाग
सूखने लगे ताल - तलैया
जहरीली फसलों ने लील लिये
पक्षियों की कई - कई प्रजातियां
मवेशियों के साथ होने लगी राजनीति
फिर एकाएक आई महामारी
शिकारियों ने पूरी कर ली
शिकार की तैयारी
आपदा को अवसर बनाया
भ्रम का जाल फैलाया
" छः हजार " का पासा फेंका
हमला भीतर से हुआ
हमला अपनों ने किया
गाँव रह गया हतप्रभ !
अचानक गाँव की तंद्रा हुई भंग
उसे सर्वस्व लुटता दिखा
वह निकला बाहर मदहोशी से
समझ गया उनकी साजिशें
एकजुट होकर ललकारा
रणभेरियाँ बज उठीं
गाँव ने दिल्ली की ओर किया कूच
किंतु , सरहद पर कर दी गई बैरिकेडिंग
कर दिये गए तैनात गाँव के ही लाडले
भिड़ा दिया सियासत ने बेटों को बाप से
तब से गाँव ने घेर रखा है दिल्ली
लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई
दे रहा है रोज ही शहादत
ठान रखा है मन में
दिल्ली को झुकाएगा
घुटने टिकवायेगा
हौसले बुलंद हैं गाँव के
क्योंकि , जानता है वह
उस पर ही टिकी है सारी कायनात ।
---- कुमार सत्येन्द्र
गाँव अब शहर से हो गए हैं
गड़ गए हैं बिजली के पोल
पगडंडियों पर बिछ गई हैं
अलकतरा से सनी गिट्टियां
जम गए हैं गर्द - गुबार अतीत के चिह्नों पर
खुली हवा अब नहीं रही स्वच्छ
भर गई है गाड़ियों के काफिले से उड़ी धूल
और आ रही है उससे साजिशों की बू
चढ़ गया है गाँव
किसी की नजर पर
चुभ रहे हैं सोना उगलते खेत
किसी की आँखों में
तीन दशक पहले बनी थी योजना
भोला-भाला गाँव
समझ नहीं पाया
उनकी गहरी चाल
ऊँची उड़ान की ललक में
खुद ही हो गया विस्थापित
कर गया पलायन शहर की ओर
शहर की परिधि पर
बस गईं गंदी - बजबजाती बस्तियाँ
वादों और आकड़ों के खेल में
उलझकर रह गया गाँव
अपने परिवर्तित रंग - रूप में
रिश्तों की नाजुक डोर छीजती गई
शहर की चकाचौंध में खो गया गाँव
रिक्त होती गई गाँव की गोद
उजड़ने लगे बाग
सूखने लगे ताल - तलैया
जहरीली फसलों ने लील लिये
पक्षियों की कई - कई प्रजातियां
मवेशियों के साथ होने लगी राजनीति
फिर एकाएक आई महामारी
शिकारियों ने पूरी कर ली
शिकार की तैयारी
आपदा को अवसर बनाया
भ्रम का जाल फैलाया
" छः हजार " का पासा फेंका
हमला भीतर से हुआ
हमला अपनों ने किया
गाँव रह गया हतप्रभ !
अचानक गाँव की तंद्रा हुई भंग
उसे सर्वस्व लुटता दिखा
वह निकला बाहर मदहोशी से
समझ गया उनकी साजिशें
एकजुट होकर ललकारा
रणभेरियाँ बज उठीं
गाँव ने दिल्ली की ओर किया कूच
किंतु , सरहद पर कर दी गई बैरिकेडिंग
कर दिये गए तैनात गाँव के ही लाडले
भिड़ा दिया सियासत ने बेटों को बाप से
तब से गाँव ने घेर रखा है दिल्ली
लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई
दे रहा है रोज ही शहादत
ठान रखा है मन में
दिल्ली को झुकाएगा
घुटने टिकवायेगा
हौसले बुलंद हैं गाँव के
क्योंकि , जानता है वह
उस पर ही टिकी है सारी कायनात ।
---- कुमार सत्येन्द्र
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