(लघुकथा)
** इस्तीफा **
कांस्टेबल अमर सिंह को एसपी के यहाँ बुक कर दिया गया । चार्ज लगा अनुशासनहीनता का । कल किसानों की जुलूस पर लाठीचार्ज करते समय अचानक ही उसके हाथ रुक गए थे । इंस्पेक्टर के लाख कहने पर भी वह जड़वत खड़ा रहा था । इसीलिए आज उसकी पेशी थी ।
जब उसे अंदर से बुलावा आया , तो वह सिर झुकाए कमरे में दाखिल हुआ ।
एसपी ने कड़कते हुए कहा -- " सिपाही ! तूने अनुशासन भंग किया है । जानते हो इसकी सजा ? तुम्हें चार्जशीट मिलेगा । तुम निलंबित भी हो सकते हो । पर , उससे पहले मैं जानना चाहता हूँ कि तुम जैसे बहादुर सिपाही ने ऐसा क्यों किया ? "
अमर पूर्ववत् सिर झुकाए खड़ा रहा । उसकी चुप्पी एसपी को खलने लगी ।
उसने कड़ककर पूछा -- " बोलो ...जवाब दो ?"
अमर ने सिर झुकाए हुए ही धीमें स्वर में जवाब दिया --" सर ! जिन हाथों ने मुझे चलना सिखाया , बचपन में जिन बाहों में मैंने झूला झुला , जिन कंधों पर बैठकर मैं मेला - बाजार घूमने गया । जिसके होने से ही मैं हूँ । उस पर मैं भला लाठी कैसे चला सकता था ! मेरे सामने .....।"
इतना कहकर वह फफक् फफक् कर रो पड़ा । रोते हुए उसने मुट्ठी में दबा एक कागज एसपी की ओर बढ़ाया । कागज लेते हुए एसपी ने पूछा -- " यह क्या है ? "
अमर ने संयत होते हुए कहा -- " सर ! इ..स्ती...फा ...।"
--- कुमार सत्येन्द्र
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